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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 15

58 Sukta
15 Mantra
4/31/15
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्माक॑मुत्त॒मं कृ॑धि॒ श्रवो॑ दे॒वेषु॑ सूर्य। वर्षि॑ष्ठं॒ द्यामि॑वो॒परि॑ ॥१५॥

अ॒स्माक॑म् । उ॒त्ऽत॒मम् । कृ॒धि॒ । श्रवः॑ । दे॒वेषु॑ । सू॒र्य॒ । वर्षि॑ष्ठम् । द्याम्ऽइ॑व । उ॒परि॑ ॥

Mantra without Swara
अस्माकमुत्तमं कृधि श्रवो देवेषु सूर्य। वर्षिष्ठं द्यामिवोपरि ॥

अस्माकम्। उत्ऽतमम्। कृधि। श्रवः। देवेषु। सूर्य। वर्षिष्ठम्। द्याम्ऽइव। उपरि ॥१५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 5

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Meaning
हे (सूर्य्य) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान राजन् ! आप (उपरि) ऊपर वर्त्तमान (द्यामिव) प्रकाश के सदृश (अस्माकम्) हम लोगों के (उत्तमम्) अत्यन्त श्रेष्ठ (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बड़े हुए (श्रवः) अन्न आदि वा श्रवण को (देवेषु) विद्वानों में (कृधि) करिये ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जैसे आकाश में सूर्य्य बड़ा है, वैसे ही विद्या और विनय की उन्नति से उत्तम ऐश्वर्य्य को उत्पन्न करो ॥१५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के धर्म वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१५॥ यह कतीसवाँ सूक्त और छब्बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥