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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 14

58 Sukta
15 Mantra
4/31/14
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्माकं॑ धृष्णु॒या रथो॑ द्यु॒माँ इ॒न्द्रान॑पच्युतः। ग॒व्युर॑श्व॒युरी॑यते ॥१४॥

अ॒स्माक॑म् । धृ॒ष्णु॒ऽया । रथः॑ । द्यु॒ऽमान् । इ॒न्द्र॒ । अन॑पऽच्युतः । ग॒व्युः । अ॒श्व॒युः । ई॒य॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
अस्माकं धृष्णुया रथो द्युमाँ इन्द्रानपच्युतः। गव्युरश्वयुरीयते ॥

अस्माकम्। धृष्णुऽया। रथः। द्युऽमान्। इन्द्र। अनपऽच्युतः। गव्युः। अश्वऽयुः। ईयते ॥१४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! जो (अस्माकम्) हम लोगों को (धृष्णुया) दृढ़ता से युक्त (द्युमान्) बहुत कलायन्त्र आदि से प्रकाशित (अनपच्युतः) घटने से रहित (गव्युः) बहुत गौओं और (अश्वयुः) बहुत घोड़ों के बल से युक्त (रथः) शीघ्र पहुँचानेवाला विमान आदि विशेष वाहन (ईयते) जाता है, उसके साथ शत्रुओं को जीतिये ॥१४॥
Essence
राजा और प्रजाजन ऐसा मानें कि जो राजा के पदार्थ वे हम लोगों के और जो हम लोगों के वे राजा के हैं ॥१४॥
Subject
फिर राजाप्रजा धर्मविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥