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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 13

58 Sukta
15 Mantra
4/31/13
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्मभ्यं॒ ताँ अपा॑ वृधि व्र॒जाँ अस्ते॑व॒ गोम॑तः। नवा॑भिरिन्द्रो॒तिभिः॑ ॥१३॥

अ॒स्मभ्य॑म् । तान् । अप॑ । वृ॒धि॒ । व्र॒जान् । अस्ता॑ऽइव । गोऽम॑तः । नवा॑भिः । इ॒न्द्र॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
अस्मभ्यं ताँ अपा वृधि व्रजाँ अस्तेव गोमतः। नवाभिरिन्द्रोतिभिः ॥

अस्मभ्यम्। तान्। अप। वृधि। व्रजान्। अस्ताऽइव। गोऽमतः। नवाभिः। इन्द्र। ऊतिऽभिः ॥१३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) परम ऐश्वर्य्य के देनेवाले राजन् ! आप (नवाभिः) नवीन (ऊतिभिः) रक्षादिकों से (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (गोमतः) जिनमें बहुत गौएँ विद्यमान और (व्रजान्) बहुत गौएँ जातीं (तान्) उन गोड़ों (अस्तेव) गृहों के समान बढ़ाइये और दुःखों को (अपा, वृधि) न्यून कीजिये, नष्ट कीजिये ॥१३॥
Essence
हे राजन् ! जैसे गोपाल गौओं को बढ़ा के दुग्धादिकों से आढ्य होते हैं, वैसे ही हम लोगों की वृद्धि करो और आढ्य होकर सदैव आनन्द कीजिये ॥१३॥
Subject
फिर प्रजावृद्धिप्रकार से राजप्रजाधर्म विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥