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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 11

58 Sukta
15 Mantra
4/31/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पिपीलिकामध्यागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒स्माँ इ॒हा वृ॑णीष्व स॒ख्याय॑ स्व॒स्तये॑। म॒हो रा॒ये दि॒वित्म॑ते ॥११॥

अ॒स्मान् । इ॒ह । वृ॒णी॒ष्व॒ । स॒ख्याय॑ । स्व॒स्तये॑ । म॒हः । रा॒ये । दि॒वित्म॑ते ॥

Mantra without Swara
अस्माँ इहा वृणीष्व सख्याय स्वस्तये। महो राये दिवित्मते ॥

अस्मान्। इह। वृणीष्व। सख्याय। स्वस्तये। महः। राये। दिवित्मते ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 26 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे तेजस्वी राजन् ! आप (इह) इस संसार वा राज्य में (अस्मान्) हम लोगों को (स्वस्तये) सुख के लिये (महः) बड़े (दिवित्मते) विद्या, धर्म्म और न्याय से प्रकाशित (सख्याय) मित्रत्व के लिये और (राये) धन के लिये (वृणीष्व) स्वीकार करो ॥११॥
Essence
हे राजन् ! जैसे आप हम लोगों में मित्रता रखते हैं, वैसे हम लोग भी आप में सदा ही मित्र हुए वर्त्ताव करें ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥