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Rigveda Mandal 4 / Sukta 31 / Mantra 1

58 Sukta
15 Mantra
4/31/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
कया॑ नश्चि॒त्र आ भु॑वदू॒ती स॒दावृ॑धः॒ सखा॑। कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥१॥

कया॑ । नः॒ । चि॒त्रः । आ । भु॒व॒त् । ऊ॒ती । स॒दाऽवृ॑धः । सखा॑ । कया॑ । शचि॑ष्ठया । वृ॒ता ॥

Mantra without Swara
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता ॥

कया। नः। चित्रः। आ। भुवत्। ऊती। सदाऽवृधः। सखा। कया। शचिष्ठया। वृता ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 24 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (सदावृधः) सर्वदा वृद्धि को प्राप्त होते हुए आप (नः) हम लोगों की (कया) किस (ऊती) रक्षण आदि क्रिया के साथ और (कया) किस (शचिष्ठया) अत्यन्त श्रेष्ठ वाणी बुद्धि वा कर्म्म जो (वृता) संयुक्त उससे (चित्रः) अद्भुत गुण, कर्म्म और स्वभाववाले (सखा) मित्र (आ, भुवत्) हूजिये ॥१॥
Essence
हे राजन् ! आपको चाहिये कि हम लोगों के साथ, वैसे कर्म्म करें कि जिनसे हम लोगों की प्रीति बढ़े ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले इकतीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजप्रजाधर्मविषय को कहते हैं ॥