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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 8

58 Sukta
24 Mantra
4/30/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ए॒तद्घेदु॒त वी॒र्य१॒॑मिन्द्र॑ च॒कर्थ॒ पौंस्य॑म्। स्त्रियं॒ यद्दु॑र्हणा॒युवं॒ वधी॑र्दुहि॒तरं॑ दि॒वः ॥८॥

ए॒तत् । घ॒ । इत् । उ॒त । वी॒र्य॑म् । इन्द्र॑ । च॒कर्थ॑ । पौंस्य॑म् । स्त्रिय॑म् । यत् । दुः॒ऽह॒ना॒युव॑म् । वधीः॑ । दु॒हि॒तर॑म् । दि॒वः ॥

Mantra without Swara
एतद्घेदुत वीर्य१मिन्द्र चकर्थ पौंस्यम्। स्त्रियं यद्दुर्हणायुवं वधीर्दुहितरं दिवः ॥

एतत्। घ। इत्। उत। वीर्यम्। इन्द्र। चकर्थ। पौंस्यम्। स्त्रियम्। यत्। दुःऽहनायुवम्। वधीः। दुहितरम्। दिवः ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
हे (इन्द्र) दोषों के नाश करनेवाले जैसे सूर्य्य (दुर्हणायुवम्) दुःख से नाश करने योग्य की कामना करनेवाले (दिवः) प्रकाश की (दुहितरम्) कन्या के सदृश वर्त्तमान प्रातर्वेला का नाश करता है, वैसे (एतत्) इस कर्म्म और (पौंस्यम्) पुरुषों के लिये हित (वीर्य्यम्) पराक्रम को (चकर्थ) करते हो और आप (घ) शत्रुओं ही का (वधीः, इत्) नाश करते ही हो (यत्) जो (स्त्रियम्) स्त्री (उत) और भृत्य को भी पालिये ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य रात्रि का नाश और दिन की उत्पत्ति करके प्राणियों को सुख देता है, वैसे ही दुष्ट आचरणों का नाश और श्रेष्ठों का पालन कर और विद्या को उत्पन्न करके सम्पूर्ण प्रजाओं को सुख देवें ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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