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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 6

58 Sukta
24 Mantra
4/30/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यत्रो॒त मर्त्या॑य॒ कमरि॑णा इन्द्र॒ सूर्य॑म्। प्रावः॒ शची॑भि॒रेत॑शम् ॥६॥

यत्र॑ । उ॒त । मर्त्या॑य । कम् । अरि॑णाः । इ॒न्द्र॒ । सूर्य॑म् । प्र । आ॒वः॒ । शची॑भिः । एत॑शम् ॥

Mantra without Swara
यत्रोत मर्त्याय कमरिणा इन्द्र सूर्यम्। प्रावः शचीभिरेतशम् ॥

यत्र। उत। मर्त्याय। कम्। अरिणाः। इन्द्र। सूर्यम्। प्र। आवः। शचीभिः। एतशम् ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 1

Bhashya

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख के देनेवाले आप (सूर्य्यम्) सूर्य्य को वायु के सदृश (शचीभिः) बुद्धियों वा कर्म्मों से (एतशम्) विद्या को प्राप्त घोड़े के सदृश बलवान् की (प्र, आवः,) रक्षा करें (यत्र) जिस राज्य में (मर्त्याय) मनुष्य के लिये (कम्) सुख (अरिणाः) देवें वहाँ (उत) भी दुष्टों को दुःख देवें ॥६॥
Essence
जहाँ राजा श्रेष्ठों का सत्कार और दुष्टों को दण्ड देकर विद्या और विनय को बढ़ाता है, वहाँ सम्पूर्ण प्रजा स्वस्थ होती है ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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