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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 5

58 Sukta
24 Mantra
4/30/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यत्र॑ दे॒वाँ ऋ॑घाय॒तो विश्वाँ॒ अयु॑ध्य॒ एक॒ इत्। त्वमि॑न्द्र व॒नूँरह॑न् ॥५॥

यत्र॑ । दे॒वान् । ऋ॒घा॒य॒तः । विश्वा॑न् । अयु॑ध्यः । एकः॑ । इत् । त्वम् । इ॒न्द्र॒ । व॒नून् । अह॑न् ॥

Mantra without Swara
यत्र देवाँ ऋघायतो विश्वाँ अयुध्य एक इत्। त्वमिन्द्र वनूँरहन् ॥

यत्र। देवान्। ऋघायतः। विश्वान्। अयुध्यः। एकः। इत्। त्वम्। इन्द्र। वनून्। अहन् ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) तेजस्वी राजन् (एकः) एक (इत्) ही (त्वम्) आप (यत्र) जहाँ (विश्वान्) सम्पूर्ण (देवान्) विद्वानों को (ऋघायतः) बाधते हुए (वनून्) अधर्म्म के सेवन करनेवालों का (अहन्) नाश करें, वहाँ शत्रुओं से (अयुध्यः) नहीं युद्ध करने योग्य अर्थात् शत्रुजन आप से युद्ध न कर सकें, ऐसे होवें ॥५॥
Essence
जब-जब दुष्टजन श्रेष्ठों को बाधा देवें, तब-तब आप सम्पूर्ण अधर्म्मियों को अत्यन्त दण्ड दीजिये ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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