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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 3

58 Sukta
24 Mantra
4/30/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विश्वे॑ च॒नेद॒ना त्वा॑ दे॒वास॑ इन्द्र युयुधुः। यदहा॒ नक्त॒माति॑रः ॥३॥

विश्वे॑ । च॒न । इत् । अ॒ना । त्वा॒ । दे॒वासः॑ । इ॒न्द्र॒ । यु॒यु॒धुः॒ । यत् । अहा॑ । नक्त॑म् । आ । अति॑रः ॥

Mantra without Swara
विश्वे चनेदना त्वा देवास इन्द्र युयुधुः। यदहा नक्तमातिरः ॥

विश्वे। चन। इत्। अना। त्वा। देवासः। इन्द्र। युयुधुः। यत्। अहा। नक्तम्। आ। अतिरः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करनेवाले (यत्) जो (विश्वे इत्) सभी (देवासः) विद्वान् जन (अना) प्रतिज्ञास्वरूप (अहा) दिनों और (नक्तम्) रात्रि को (त्वा) आपका आश्रय लेकर शत्रुओं के साथ (युयुधुः) युद्ध करते हैं, उनके (चन) भी साथ आप शत्रुओं का (आ, अतिरः) नाश करिये ॥३॥
Essence
राजा को चाहिये कि भृत्यजन उत्तम शिक्षित और श्रेष्ठ रक्खें, जिससे दिन-रात्रि शत्रु लोग छिपे हुए रहें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥