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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 22

58 Sukta
24 Mantra
4/30/22
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स घेदु॒तासि॑ वृत्रहन्त्समा॒न इ॑न्द्र॒ गोप॑तिः। यस्ता विश्वा॑नि चिच्यु॒षे ॥२२॥

सः । घ॒ । इत् । उ॒त । अ॒सि॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । स॒मा॒नः । इ॒न्द्र॒ । गोऽप॑तिः । यः । ता । विश्वा॑नि । चि॒च्यु॒षे ॥

Mantra without Swara
स घेदुतासि वृत्रहन्त्समान इन्द्र गोपतिः। यस्ता विश्वानि चिच्युषे ॥

सः। घ। इत्। उत। असि। वृत्रऽहन्। समानः। इन्द्र। गोऽपतिः। यः। ता। विश्वानि। चिच्युषे ॥२२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 23 Mantra » 2

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Meaning
हे (वृत्रहन्) शत्रुओं के नाश करनेवाले (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के कर्त्ता ! (यः) जो (गोपतिः) पृथिवी के स्वामी (समानः) सूर्य्य के सदृश आप (ता) उन (विश्वानि) सब की (चिच्युषे) वृद्धि करते (घ) ही हो (स, इत्) वही बलवान् (उत) और सुखी (असि) होते हैं ॥२२॥
Essence
जो राजा सूर्य्य के सदृश न्याय के प्रकाश से रागद्वेषवाला होता हुआ सम्पूर्ण राज्य का पालनकर्त्ता है, वही गणना करने योग्य होता है ॥२२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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