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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 20

58 Sukta
24 Mantra
4/30/20
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पिपीलिकामध्यागायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श॒तम॑श्म॒न्मयी॑नां पु॒रामिन्द्रो॒ व्या॑स्यत्। दिवो॑दासाय दा॒शुषे॑ ॥२०॥

श॒तम् । अ॒श्म॒न्ऽमयी॑नाम् । पु॒राम् । इन्द्रः॑ । वि । आ॒स्य॒त् । दिवः॑ऽदासाय । दा॒शुषे॑ ॥

Mantra without Swara
शतमश्मन्मयीनां पुरामिन्द्रो व्यास्यत्। दिवोदासाय दाशुषे ॥

शतम्। अश्मन्ऽमयीनाम्। पुराम्। इन्द्रः। वि। आस्यत्। दिवःऽदासाय। दाशुषे ॥२०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (इन्द्रः) तेजस्वी सूर्य्य के सदृश (दिवोदासाय) प्रकाश के सेवनेवाले और (दाशुषे) देनेवाले के लिये (अश्मन्मयीनाम्) मेघों के समूहों के सदृश पाषाणों से बने हुए (पुराम्) नगरों के (शतम्) सैकड़े को (वि, आस्यत्) काटे, वही विजयी होने के योग्य होवे ॥२०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो आप बहुत बढ़े हुए मेघों को जैसे सूर्य्य वैसे अनेक शत्रुओं के नगरों को जीत सकें तो राज्यलक्ष्मी और यश को प्राप्त होने के योग्य होवें ॥२०॥
Subject
फिर सूर्यदृष्टान्त से राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥