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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 19

58 Sukta
24 Mantra
4/30/19
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अनु॒ द्वा ज॑हि॒ता न॑यो॒ऽन्धं श्रो॒णं च॑ वृत्रहन्। न तत्ते॑ सु॒म्नमष्ट॑वे ॥१९॥

अनु॑ । द्वा । ज॒हि॒ता । न॒यः॒ । अ॒न्धम् । श्रो॒णम् । च॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । न । तत् । ते॒ । सु॒म्नम् । अष्ट॑वे ॥

Mantra without Swara
अनु द्वा जहिता नयोऽन्धं श्रोणं च वृत्रहन्। न तत्ते सुम्नमष्टवे ॥

अनु। द्वा। जहिता। नयः। अन्धम्। श्रोणम्। च। वृत्रऽहन्। न। तत्। ते। सुम्नम्। अष्टवे ॥१९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे (वृत्रहन्) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! जो (नयः) नायक अर्थात् अग्रणी होते हुए आप (अन्धम्) नेत्रों के विज्ञान से विकल (श्रोणं, च) और खञ्ज अर्थात् पङ्गु (द्वा) दोनों (जहिता) छोड़नेवालों का (अनु) पश्चात् पालन करें तो (ते) आपके (तत्) उस (सुम्नम्) सुख को (अष्टवे) व्याप्त होने को कोई भी शत्रु (न) नहीं समर्थ होवें ॥१९॥
Essence
जो राजा अनाथ अन्धादिकों का निरन्तर पालन करे, उसका राज्य और सुख कभी नहीं नष्ट होवे ॥१९॥
Subject
अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥