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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 16

58 Sukta
24 Mantra
4/30/16
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त त्यं पु॒त्रम॒ग्रुवः॒ परा॑वृक्तं श॒तक्र॑तुः। उ॒क्थेष्विन्द्र॒ आभ॑जत् ॥१६॥

उ॒त । त्यम् । पु॒त्रम् । अ॒ग्रुवः॑ । परा॑ऽवृक्तम् । श॒तऽक्र॑तुः । उ॒क्थेषु॑ । इन्द्रः॑ । आ । अ॒भ॒ज॒त् ॥

Mantra without Swara
उत त्यं पुत्रमग्रुवः परावृक्तं शतक्रतुः। उक्थेष्विन्द्र आभजत् ॥

उत। त्यम्। पुत्रम्। अग्रुवः। पराऽवृक्तम्। शतऽक्रतुः। उक्थेषु। इन्द्रः। आ। अभजत् ॥१६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 22 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (शतक्रतुः) असंख्यबुद्धियों वा (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवान् राजा (उक्थेषु) प्रशंसा करने योग्य शास्त्रों में (त्यम्) उस (परावृक्तम्) नहीं नष्ट हुए पराक्रमवाले (पुत्रम्) पुत्र को (अग्रुवः) अग्रगामियों के सदृश (आ, अभजत्) सब प्रकार सेवन करता है (उत) और शिक्षा भी देवे, वह सिद्धकार्य्य होवे ॥१६॥
Essence
जो राजा माता पुत्रों का जैसे वैसे प्रजाओं का पालन करे, उसको प्रजाजन पिता के समान मानें ॥१६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥