Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 15

58 Sukta
24 Mantra
4/30/15
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त दा॒सस्य॑ व॒र्चिनः॑ स॒हस्रा॑णि श॒ताव॑धीः। अधि॒ पञ्च॑ प्र॒धीँरि॑व ॥१५॥

उ॒त । दा॒सस्य॑ । व॒र्चिनः॑ । स॒हस्रा॑णि । श॒ता । अ॒व॒धीः॒ । अधि॑ । पञ्च॑ । प्र॒धीन्ऽइ॑व ॥

Mantra without Swara
उत दासस्य वर्चिनः सहस्राणि शतावधीः। अधि पञ्च प्रधीँरिव ॥

उत। दासस्य। वर्चिनः। सहस्राणि। शता। अवधीः। अधि। पञ्च। प्रधीन्ऽइव ॥१५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 5

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे राजन् ! आप (प्रधीनिव) चक्र में स्थित पैनी कीलों के सदृश वर्त्तमान संसार में कण्टक दुष्टों को (पञ्च) पाँच (शता) सौ वा (सहस्राणि) सहस्रों दुष्टों का (अधि, अवधीः) नाश करो (उत) और (वर्चिनः) बहुत पढ़े हुए (दासस्य) सेवक के जनों को पालिये ॥१५॥
Essence
वह राजा जो राजमान राजपुरुषों से यदि दुष्टों का निवारण करके श्रेष्ठों का सत्कार करे तो सम्पूर्ण जगत् उसका सेवक होवे ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.