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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 12

58 Sukta
24 Mantra
4/30/12
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ॒त सिन्धुं॑ विबा॒ल्यं॑ वितस्था॒नामधि॒ क्षमि॑। परि॑ ष्ठा इन्द्र मा॒यया॑ ॥१२॥

उ॒त । सिन्धु॑म् । वि॒ऽबा॒ल्य॑म् । वि॒ऽत॒स्था॒नाम् । अधि॑ । क्षमि॑ । परि॑ । स्थाः । इ॒न्द्र॒ । मा॒यया॑ ॥

Mantra without Swara
उत सिन्धुं विबाल्यं वितस्थानामधि क्षमि। परि ष्ठा इन्द्र मायया ॥

उत। सिन्धुम्। विऽबाल्यम्। विऽतस्थानाम्। अधि। क्षमि। परि। स्थाः। इन्द्र। मायया ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 2

Bhashya

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त आप (मायया) बुद्धि से (अधि, क्षमि) पृथिवी के बीच (वितस्थानाम्) विशेष करके स्थित नदी (उत) और (विबाल्यम्) बालपन से रहित अर्थात् छोटे नहीं बड़े (सिन्धुम्) नद के (परि) सब ओर से (स्थाः) स्थित होते हैं ॥१२॥
Essence
हे मनुष्यो ! समुद्र, नदी, नद के पार होने के लिये बुद्धि से नौका आदि को रच के लक्ष्मीवान् होओ ॥१२॥
Subject
अब मेघसंबन्धि नदीसंतरण विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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