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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 10

58 Sukta
24 Mantra
4/30/10
Devata- इन्द्रउषाश्च Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अपो॒षा अन॑सः सर॒त्संपि॑ष्टा॒दह॑ बि॒भ्युषी॑। नि यत्सीं॑ शि॒श्नथ॒द्वृषा॑ ॥१०॥

अप॑ । उ॒षाः । अन॑सः । सर॑त् । सम्ऽपि॑ष्टात् । अह॑ । बि॒भ्युषी॑ । नि । यत् । सी॒म् । शि॒श्नथ॑त् । वृषा॑ ॥

Mantra without Swara
अपोषा अनसः सरत्संपिष्टादह बिभ्युषी। नि यत्सीं शिश्नथद्वृषा ॥

अप। उषाः। अनसः। सरत्। सम्ऽपिष्टात्। अह। बिभ्युषी। नि। यत्। सीम्। शिश्नथत्। वृषा ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 5

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Meaning
जो (वृषा) बलिष्ठ राजा जैसे (बिभ्युषी) भय देनेवाली (उषाः) प्रातर्वेला (अनसः) गाड़ी के अग्रभाग के सदृश आगे चलनेवाली (सम्पिष्टात्) चूर्णित हुए (अह) ही अन्धकार से (अप, सरत्) आगे चलती है (यत्) जो (सीम्) सब प्रकार (नि, शिश्नथत्) शिथिल करती है, वैसा आचरण करे, वह सूर्य्य के सदृश तेजस्वी होवे ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे रथ का अग्रभाग आगे होता है, वैसे ही सूर्य्य के आगे प्रातःकाल चलता है और जैसे सूर्य्य अन्धकार का नाश करता है, वैसे राजा अन्याय के आचार का नाश करे ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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