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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 1

58 Sukta
24 Mantra
4/30/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नकि॑रिन्द्र॒ त्वदुत्त॑रो॒ न ज्यायाँ॑ अस्ति वृत्रहन्। नकि॑रे॒वा यथा॒ त्वम् ॥१॥

नकिः॑ । इ॒न्द्र॒ । त्वत् । उत्ऽत॑रः । न । ज्याया॑न् । अ॒स्ति॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । नकिः॑ । ए॒व । यथा॑ । त्वम् ॥

Mantra without Swara
नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायाँ अस्ति वृत्रहन्। नकिरेवा यथा त्वम् ॥

नकिः। इन्द्र। त्वत्। उत्ऽतरः। न। ज्यायान्। अस्ति। वृत्रऽहन्। नकिः। एव। यथा। त्वम् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 19 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृत्रहन्) मेघ को नाश करनेवाले सूर्य के सदृश वर्त्तमान (इन्द्र) राजन् ! (यथा) जैसे (त्वम्) आप हो, वैसे ही (त्वत्) आप से (उत्तरः) पीछे (नकिः) नहीं (अस्ति) है (न) नहीं (ज्यायान्) बड़ा है और (नकिः, एव) न उत्तम ही है ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सबसे श्रेष्ठ होवे, उसी का राजा करो ॥१॥
Subject
अब चौबीस ऋचावाले तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में सूर्यदृष्टान्त से राजविषय को कहते हैं ॥