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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 9

58 Sukta
16 Mantra
4/3/9
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तेन॑ ऋ॒तं निय॑तमीळ॒ आ गोरा॒मा सचा॒ मधु॑मत्प॒क्वम॑ग्ने। कृ॒ष्णा स॒ती रुश॑ता धा॒सिनै॒षा जाम॑र्येण॒ पय॑सा पीपाय ॥९॥

ऋ॒तेन॑ । ऋ॒तम् । निऽय॑तम् । ई॒ळे॒ । आ । गोः । आ॒मा । सचा॑ । मधु॑ऽमत् । प॒क्वम् । अ॒ग्ने॒ । कृ॒ष्णा । स॒ती । रुश॑ता । धा॒सिना॑ । ए॒षा । जाम॑र्येण । पय॑सा । प्प्य् ॥

Mantra without Swara
ऋतेन ऋतं नियतमीळ आ गोरामा सचा मधुमत्पक्वमग्ने। कृष्णा सती रुशता धासिनैषा जामर्येण पयसा पीपाय ॥

ऋतेन। ऋतम्। निऽयतम्। ईळे। आ। गोः। आमा। सचा। मधुऽमत्। पक्वम्। अग्ने। कृष्णा। सती। रुशता। धासिना। एषा। जामर्येण। पयसा। पीपाय॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशमान विद्वान् पुरुष ! जिस प्रकार से मैं (गोः) पृथिवी वा वाणी के (ऋतेन) सत्य से (नियतम्) नियमयुक्त (ऋतम्) सत्य की (ईळे) स्तुति वा ढूँढ करता हूँ, वैसे आचरण करते हुए आप पृथिवी के मध्य में (सचा) प्रसङ्ग से (मधुमत्) श्रेष्ठ मधुर आदि गुणों से युक्त (आमा) कच्चे और (पक्वम्) पक्के पदार्थों की (आ, पीपाय) अच्छे प्रकार वृद्धि करो और जैसे (एषा) यह (कृष्णा) श्याम वर्ण (सती) सज्जन पण्डिता पतिव्रता स्त्री (रुशता) उत्तम स्वरूप से (जामर्येण) जीवन में निमित्त (पयसा) दुग्ध और (धासिना) अन्न से बढ़ती है, वैसे आप वृद्धि को प्राप्त होओ ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य ब्रह्मचर्य से विद्या और उत्तम शिक्षा को प्राप्त होके और धर्मयुक्त व्यवहार से धर्म का अन्वेषण और इन्द्रियजित् होने से नियम से भोजन करनेवाले होकर पुरुषार्थ करते हैं, वे स्नेही स्त्री और पुरुष के सदृश आनन्दित होकर सब प्रकार वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥९॥
Subject
अब मनुष्य को ब्रह्मचर्य्य आदि से पुरुषार्थ सेवना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥