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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 8

58 Sukta
16 Mantra
4/3/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क॒था शर्धा॑य म॒रुता॑मृ॒ताय॑ क॒था सू॒रे बृ॑ह॒ते पृ॒च्छ्यमा॑नः। प्रति॑ ब्र॒वोऽदि॑तये तु॒राय॒ साधा॑ दि॒वो जा॑तवेदश्चिकि॒त्वान् ॥८॥

क॒था । शर्धा॑य । म॒रुता॑म् । ऋ॒ताय॑ । क॒था । सू॒रे । बृ॒ह॒ते । पृ॒च्छ्यमा॑नः । प्रति॑ । ब्र॒वः॒ । अदि॑तये । तु॒राय॑ । साध॑ । दि॒वः । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ । चि॒कि॒त्वान् ॥

Mantra without Swara
कथा शर्धाय मरुतामृताय कथा सूरे बृहते पृच्छ्यमानः। प्रति ब्रवोऽदितये तुराय साधा दिवो जातवेदश्चिकित्वान् ॥

कथा। शर्धाय। मरुताम्। ऋताय। कथा। सूरे। बृहते। पृच्छ्यमानः। प्रति। ब्रवः। अदितये। तुराय। साध। दिवः। जातऽवेदः। चिकित्वान्॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जातवेदः) प्रसिद्ध उत्तम ज्ञानयुक्त (सूरे) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान सेना में (पृच्छ्यमानः) पूँछे गए आप (मरुताम्) पवनों का जैसे वैसे (ऋताय) सत्य के और (बृहते) बढ़ते हुए (शर्धाय) बल के लिये (कथा) किस प्रकार से (ब्रवः) कहो (तुराय) शीघ्रता करते हुए (अदितये) नहीं नाश होनेवाले अन्तरिक्ष के लिये (कथा) किस प्रकार से (प्रति) निश्चित कहो (चिकित्वान्) ज्ञानवान् होकर (दिवः) प्रकाशों को (साध) सिद्ध करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा लोग वायु के सदृश अपने बल को बढ़ाते, योधा लोगों के शिक्षक और परीक्षकों का सत्कार करते और प्रश्नोत्तर से सब को जान उनके द्वारा कार्य सिद्ध करते हैं, वे सूर्य्य के सदृश ऐश्वर्य के प्रकाशक होते हैं ॥८॥
Subject
अब अगले मन्त्र में राजविषय को कहते हैं ॥