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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 6

58 Sukta
16 Mantra
4/3/6
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
कद्धिष्ण्या॑सु वृधसा॒नो अ॑ग्ने॒ कद्वाता॑य॒ प्रत॑वसे शुभं॒ये। परि॑ज्मने॒ नास॑त्याय॒ क्षे ब्रवः॒ कद॑ग्ने रु॒द्राय॑ नृ॒घ्ने ॥६॥

कत् । धिष्ण्या॑सु । वृ॒ध॒सा॒नः । अ॒ग्ने॒ । कत् । वाता॑य । प्रऽत॑वसे । शु॒भँ॒म्ये । परि॑ऽज्मने । नास॑त्याय । क्षे । ब्रवः॑ । कत् । अ॒ग्ने॒ । रु॒द्राय॑ । नृ॒ऽघ्ने ॥

Mantra without Swara
कद्धिष्ण्यासु वृधसानो अग्ने कद्वाताय प्रतवसे शुभंये। परिज्मने नासत्याय क्षे ब्रवः कदग्ने रुद्राय नृघ्ने ॥

कत्। धिष्ण्यासु। वृधसानः। अग्ने। कत्। वाताय। प्रऽतवसे। शुभम्ऽये। परिऽज्मने। नासत्याय। क्षे। ब्रवः। कत्। अग्ने। रुद्राय। नृऽघ्ने॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रकाशमान आप ! (धिष्ण्यासु) बुद्धि में उत्पन्न क्रियाओं में (वृधसानः) बढ़नेवालों का विभाग करते हुए (प्रतवसे) श्रेष्ठ बल और (वाताय) विज्ञान के लिये (कत्) कब (ब्रवः) कहो (अग्ने) हे विद्वन् राजन् ! (परिज्मने) सब ओर भूमि जिसके उस (शुभंये) कल्याण को प्राप्त होनेवाले (नासत्याय) असत्य आचरण से रहित के लिये (कत्) कब कहो (क्षे) पृथिवी राज्य के लिये विद्यमान जिसमें उसमें (नृघ्ने) शत्रुओं के नायकों के नाश करने और (रुद्राय) दुष्ट पुरुषों को रुलानेवाले के लिये (कत्) कब कहो ॥६॥
Essence
राजा आदि अध्यक्षों के प्रति अध्यापक, उपदेशक और मन्त्रीजन ऐसा उपदेश देवें कि आप लोग बुद्धि के कामों में वृद्ध, बलिष्ठ, उत्तम आचरणवाले, सत्यवादी और दुष्ट पुरुषों के नाश करनेवाले कब होओगे और उत्तम आचरण करने और दुष्ट आचरण के त्याग में विलम्ब न करो ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥