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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 2

58 Sukta
16 Mantra
4/3/2
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं योनि॑श्चकृ॒मा यं व॒यं ते॑ जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑। अ॒र्वा॒ची॒नः परि॑वीतो॒ नि षी॑दे॒मा उ॑ ते स्वपाक प्रती॒चीः ॥२॥

अ॒यम् । योनिः॑ । च॒कृ॒म । यम् । व॒यम् । ते॒ । जा॒याऽइ॑व । पत्ये॑ । उ॒श॒ती । सु॒ऽवासाः॑ । अ॒र्वा॒ची॒नः । परि॑ऽवीतः । नि । सी॒द॒ । इ॒माः । ऊँ॒ इति॑ । ते॒ । सु॒ऽअ॒पा॒क॒ । प्र॒ती॒चीः ॥

Mantra without Swara
अयं योनिश्चकृमा यं वयं ते जायेव पत्य उशती सुवासाः। अर्वाचीनः परिवीतो नि षीदेमा उ ते स्वपाक प्रतीचीः ॥

अयम्। योनिः। चकृम। यम्। वयम्। ते। जायाऽइव। पत्ये। उशती। सुऽवासाः। अर्वाचीनः। परिऽवीतः। नि। सीद। इमाः। ऊम् इति। ते। सुऽअपाक। प्रतीचीः॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! (वयम्) हम लोग (ते) आपके (यम्) जिस गृह को (चकृम) बनावें सो (अयम्) यह (योनिः) गृह (पत्ये) स्वामी के लिये (उशती) कामना करती हुई (सुवासाः) सुन्दर वस्त्रों से शोभित (जायेव) मन की प्यारी स्त्री के सदृश (अर्वाचीनः) इस वर्त्तमानकाल में हुआ (परिवीतः) सब प्रकार व्याप्त उत्तम गुण जिसमें ऐसा हो, उसमें आप (नि, सीद) निवास करो और (स्वपाक) हे उत्तम प्रकार परिपक्व ज्ञानवाले ! (प्रतीचीः) प्रतीति को प्राप्त होती हुई (इमाः) यह वर्त्तमान प्रजा (उ) और (ते) आपके भक्त हों ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजा को चाहिये कि ऐसा गृह बनावे कि जो पतिव्रता सुन्दरी मन की प्यारी स्त्री के सदृश सब ऋतुओं में सुख देवे और वहाँ स्थित हुआ ऐसे कर्म करे कि जिन कर्मों से अपनी प्रजा अनुरक्त होवें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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