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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 16

58 Sukta
16 Mantra
4/3/16
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒ता विश्वा॑ वि॒दुषे॒ तुभ्यं॑ वेधो नी॒थान्य॑ग्ने नि॒ण्या वचां॑सि। नि॒वच॑ना क॒वये॒ काव्या॒न्यशं॑सिषं म॒तिभि॒र्विप्र॑ उ॒क्थैः ॥१६॥

ए॒ता । विश्वा॑ । वि॒दुषे॑ । तुभ्य॑म् । वे॒धः॒ । नी॒थानि॑ । अ॒ग्ने॒ । नि॒ण्या । वचां॑सि । नि॒ऽवच॑ना । क॒वये॑ । काव्या॑नि । अशं॑सिषम् । म॒तिऽभिः॑ । विप्रः॑ । उ॒क्थैः ॥

Mantra without Swara
एता विश्वा विदुषे तुभ्यं वेधो नीथान्यग्ने निण्या वचांसि। निवचना कवये काव्यान्यशंसिषं मतिभिर्विप्र उक्थैः ॥

एता। विश्वा। विदुषे। तुभ्यम्। वेधः। नीथानि। अग्ने। निण्या। वचांसि। निऽवचना। कवये। काव्यानि। अशंसिषम्। मतिऽभिः। विप्रः। उक्थैः॥१६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 6

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Meaning
हे (वेधः) बुद्धिमान् (अग्ने) राजन् ! (विप्रः) मेधावी जन मैं (उक्थैः) प्रशंसा करने योग्य (मतिभिः) विद्वानों के साथ जो (काव्यानि) कवियों ने रचे शास्त्र उनकी (अशंसिषम्) प्रशंसा करता हूँ और उन (विश्वा) सम्पूर्ण (एता) इन (निण्या) निर्णय किये गये (निवचना) अत्यन्त अर्थों को कहनेवाले (वचांसि) वचनों को (विदुषे) विद्वान् (कवये) उत्तम बुद्धिवाले (तुभ्यम्) आपके लिये (नीथानि) प्राप्त किये गये प्रशंसूँ अर्थात् वह आपको प्राप्त हुए ऐसी प्रशंसा करूँ ॥१६॥
Essence
वही निश्चित प्रशंसा जानने योग्य है कि जो धार्मिक विद्वानों से की जाय। अध्यापक और उपदेशक जनों को चाहिये कि पढ़ने और उपदेश देनेवालों को सदा ही सत्यवादी और विद्वान् करें ॥१६॥ इस सूक्त में अग्नि, राजा और प्रज्जदिकों के कृत्य और गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१६॥ यह तीसरा सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब प्रजा विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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