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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 14

58 Sukta
16 Mantra
4/3/14
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रक्षा॑ णो अग्ने॒ तव॒ रक्ष॑णेभी रारक्षा॒णः सु॑मख प्रीणा॒नः। प्रति॑ ष्फुर॒ वि रु॑ज वी॒ड्वंहो॑ ज॒हि रक्षो॒ महि॑ चिद्वावृधा॒नम् ॥१४॥

रक्षा॑णः । अ॒ग्ने॒ । तव॑ । रक्ष॑णेभिः । र॒र॒क्षा॒णः । सु॒ऽम॒ख॒ । प्री॒णा॒नः । प्रति॑ । स्फु॒र॒ । वि । रु॒ज॒ । वी॒ळु । अंहः॑ । ज॒हि । रक्षः॑ । महि॑ । चित् । व॒वृ॒धा॒नम् ॥

Mantra without Swara
रक्षा णो अग्ने तव रक्षणेभी रारक्षाणः सुमख प्रीणानः। प्रति ष्फुर वि रुज वीड्वंहो जहि रक्षो महि चिद्वावृधानम् ॥

रक्ष। नः। अग्ने। तव। रक्षणेभिः। ररक्षाणः। सुऽमख। प्रीणानः। प्रति। स्फुर। वि रुज। वीळु। अंहः। जहि। रक्षः। महि। चित्। ववृधानम्॥१४॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुमख) उत्तम न्याय व्यवहार के पालन करनेवाले (अग्ने) राजन् ! आप (नः) हम लोगों की (रक्ष) रक्षा करो और (महि) बड़े (वावृधानम्) अत्यन्त वृद्धि को प्राप्त हुए की (रारक्षाणः) रक्षा करते (प्रीणानः) प्रसन्न होते वा प्रसन्न करते हुए, (प्रति, स्फुर) पुरुषार्थ करो और शत्रु को (वीळु) दृढ़ (वि, रुज) विशेषता से अच्छे प्रकार भग्न करो और (अंहः) पाप का (जहि) नाश करो (रक्षः) दुष्ट शत्रु का भङ्ग करो और जिससे (तव) आपके (चित्) भी (रक्षणेभिः) अनेक प्रकार के उपायों से हम लोग सुखी होवें ॥१४॥
Essence
वे ही राजा लोग यश के भागी हैं कि जो दुष्ट पुरुषों की दुष्टता को दूर कर और श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेष्ठता बढ़ा के राज्य का निरन्तर पिता के समान अर्थात् पिता अपने पुत्र की पालना करता, वैसे पालन करें ॥१४॥
Subject
अब राज्यपालन विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥