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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 11

58 Sukta
16 Mantra
4/3/11
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒तेनाद्रिं॒ व्य॑सन्भि॒दन्तः॒ समङ्गि॑रसो नवन्त॒ गोभिः॑। शु॒नं नरः॒ परि॑ षदन्नु॒षास॑मा॒विः स्व॑रभवज्जा॒ते अ॒ग्नौ ॥११॥

ऋतेन॑ । अद्रि॑म् । वि । अ॒स॒न् । भि॒दन्तः॑ । सम् । अङ्गि॑रसः । न॒व॒न्त॒ । गोऽभिः॑ । शु॒नम् । नरः॑ । परि॑ । स॒द॒न् । उ॒षस॑म् । आ॒विः । स्वः॑ । अ॒भ॒व॒त् । जा॒ते । अ॒ग्नौ ॥

Mantra without Swara
ऋतेनाद्रिं व्यसन्भिदन्तः समङ्गिरसो नवन्त गोभिः। शुनं नरः परि षदन्नुषासमाविः स्वरभवज्जाते अग्नौ ॥

ऋतेन। अद्रिम्। वि। असन्। भिदन्तः। सम्। अङ्गिरसः। नवन्त। गोभिः। शुनम्। नरः। परि। सदन्। उषसम्। आविः। स्वः। अभवत्। जाते। अग्नौ॥११॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 22 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) नायक होते हुए विद्वान् लोगो ! जैसे (गोभिः) किरणों के सदृश वाणियों से (अङ्गिरसः) पवन (ऋतेन) जल के सहित वर्त्तमान (अद्रिम्) मेघ के (सम्, भिदन्तः) अच्छे प्रकार टुकड़े करते हुए (वि, असन्) विविध प्रकार से फेंकते हैं (उषसम्) और प्रातःकाल को (परि, सदन्) प्राप्त होते हैं वा (जाते) उत्पन्न हुए (अग्नौ) अग्नि में (स्वः) सूर्य्य (आविः) प्रकट (अभवत्) होता है, वैसे (शुनम्) सुख की (नवन्त) प्रशंसा करो ॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो राजा आदि वीर क्षत्रिय जैसे पवन से युक्त बिजुलियाँ मेघ को इधर-उधर चलाय और तोड़ पृथिवी पर गिरा के सब को सुख देती हैं और दूसरी बिजुली का विलोडन करके सूर्य्य को उत्पन्न करती हैं, वैसे ही दुष्ट पुरुषों का नाश और न्याय का प्रकाश, बुद्धि का विलोडन और विद्या को उत्पन्न करके सूर्य्य के सदृश प्रकाशमान हुए अतुल सुख को प्राप्त होओ ॥११॥
Subject
अब राजा आदि क्षत्रियों के लिये उपदेश अगले मन्त्र में करते हैं।