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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 10

58 Sukta
16 Mantra
4/3/10
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तेन॒ हि ष्मा॑ वृष॒भश्चि॑द॒क्तः पुमाँ॑ अ॒ग्निः पय॑सा पृ॒ष्ठ्ये॑न। अस्प॑न्दमानो अचरद्वयो॒धा वृषा॑ शु॒क्रं दु॑दुहे॒ पृश्नि॒रूधः॑ ॥१०॥

ऋ॒तेनः॑ । हि । स्म॒ । वृ॒ष॒भः । चि॒त् । अ॒क्तः । पुमा॑न् । अ॒ग्निः । पय॑सा । पृ॒ष्ट्ये॑न । अस्प॑न्दमानः । अ॒च॒र॒त् । व॒यः॒ऽधाः । वृषा॑ । शु॒क्रम् । दु॒दु॒हे॒ । पृश्निः॑ । ऊधः॑ ॥

Mantra without Swara
ऋतेन हि ष्मा वृषभश्चिदक्तः पुमाँ अग्निः पयसा पृष्ठ्येन। अस्पन्दमानो अचरद्वयोधा वृषा शुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः ॥

ऋतेन। हि। स्म। वृषभः। चित्। अक्तः। पुमान्। अग्निः। पयसा। पृष्ठ्येन। अस्पन्दमानः। अचरत्। वयःऽधाः। वृषा। शुक्रम्। दुदुहे। पृश्निः। ऊधः॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (हि) जिससे कि आप (ऋतेन) सत्य व्यवहार से (वृषभः) बलिष्ठ (अक्तः) उत्तम गुणों से युक्त (पयसा) रात्रि के साथ (अग्निः) अग्नि के समान (पृष्ठ्येन) पृष्ठ भाग में होनेवाले दिन में (पुमान्) पुरुषार्थी (अस्पन्दमानः) किञ्चित् चले हुए (वयोधाः) सुन्दर अवस्था जीवन और धनादिकों के धारण करने (वृषा) सुखों की वृष्टि करनेवाले होते हुए (अचरत्) विचरते हैं (पृश्निः) अन्तरिक्ष (ऊधः) और रात्रि के सदृश (चित्) सो भी (शुक्रम्) वीर्य्य को (स्म) ही (दुदुहे) पूरा करते हैं ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे पृथिवी के अर्द्धभाग में बिजुली सूर्य रूप से शोभित होती है और दूसरे भाग में रात्रि के समय छिपी हुई चलती है, वैसे ही शयन और जागरण नियम से कर और पुरुषार्थ करके वीर्य बढ़ाय के सौ वर्ष की अवस्थायुक्त हुए सब को आनन्द दीजिये ॥१०॥
Subject
फिर भी पुरुषार्थ कर्त्तव्यता को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥