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Rigveda Mandal 4 / Sukta 3 / Mantra 1

58 Sukta
16 Mantra
4/3/1
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वो॒ राजा॑नमध्व॒रस्य॑ रु॒द्रं होता॑रं सत्य॒यजं॒ रोद॑स्योः। अ॒ग्निं पु॒रा त॑नयि॒त्नोर॒चित्ता॒द्धिर॑ण्यरूप॒मव॑से कृणुध्वम् ॥१॥

आ । वः॒ । राजा॑नम् । अ॒ध्व॒रस्य॑ । रु॒द्रम् । होता॑रम् । स॒त्य॒ऽयज॒म् । रोद॑स्योः । अ॒ग्निम् । पु॒रा । त॒न॒यि॒त्नोः । अ॒चित्ता॑त् । हिर॑ण्यऽरूपम् । अव॑से । कृ॒णु॒ध्व॒म् ॥

Mantra without Swara
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं होतारं सत्ययजं रोदस्योः। अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम् ॥

आ। वः। राजानम्। अध्वरस्य। रुद्रम्। होतारम्। सत्यऽयजम्। रोदस्योः। अग्निम्। पुरा। तनयित्नोः। अचित्तात्। हिरण्यऽरूपम्। अवसे। कृणुध्वम्॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 4 Varga » 20 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे यथार्थवक्ता विद्वानो ! जैसे हम लोग (वः) आपके (अध्वरस्य) न नष्ट करने योग्य राज्य के (अवसे) धर्मात्माओं की रक्षा और दुष्टों के नाश करने के लिये (होतारम्) देने (सत्ययजम्) सत्य ही को प्राप्त होने और (रुद्रम्) दुष्टों के रुलानेवाले (अचित्तात्) जिसमें चित्त नहीं स्थिर होता, ऐसी (तनयित्नोः) बिजुली के (हिरण्यरूपम्) तेजरूप के समान रूपवाले वा (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी के मध्य में (अग्निम्) सूर्य्य के सदृश (राजानम्) प्रकाशमान न्याय (पुरा) प्रथम करें, वैसा हम लोगों के बीच राजा आप लोग (आ, कृणुध्वम्) सब प्रकार करें ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वान् लोगो ! राजा और प्रजाजनों के साथ एक सम्मति करके जैसे ईश्वर ने ब्रह्माण्ड के मध्य में सूर्य्य को स्थित करके सब का प्रियसुख साधन किया, वैसे ही हम लोगों के मध्य में उत्तम गुण, कर्म और स्वभावयुक्त को राजा करके हम लोगों के हित को आप लोग सिद्ध करो, जिससे आप लोगों का भी प्रिय सिद्ध होवे ॥१॥
Subject
अब सोलह ऋचावाले तीसरे सूक्त का वर्णन है उसके प्रथम मन्त्र में सूर्य्यरूप अग्नि के दृष्टान्त से राज प्रजाजनों के कृत्य का वर्णन करते हैं ॥