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Rigveda Mandal 4 / Sukta 29 / Mantra 5

58 Sukta
5 Mantra
4/29/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वोता॑सो मघवन्निन्द्र॒ विप्रा॑ व॒यं ते॑ स्याम सू॒रयो॑ गृ॒णन्तः॑। भे॒जा॒नासो॑ बृ॒हद्दि॑वस्य रा॒य आ॑का॒य्य॑स्य दा॒वने॑ पुरु॒क्षोः ॥५॥

त्वाऽऊ॑तासः । म॒घ॒ऽव॒न् । इ॒न्द्र॒ । विप्राः॑ । व॒यम् । ते॒ । स्या॒म॒ । सू॒रयः॑ । गृ॒णन्तः॑ । भे॒जा॒नासः॑ । बृ॒हत्ऽदि॑वस्य । रा॒यः । आ॒ऽका॒य्य॑स्य । दा॒वने॑ । पु॒रु॒ऽक्षोः ॥

Mantra without Swara
त्वोतासो मघवन्निन्द्र विप्रा वयं ते स्याम सूरयो गृणन्तः। भेजानासो बृहद्दिवस्य राय आकाय्यस्य दावने पुरुक्षोः ॥

त्वाऽऊतासः। मघऽवन्। इन्द्र। विप्राः। वयम्। ते। स्याम। सूरयः। गृणन्तः। भेजानासः। बृहत्ऽदिवस्य। रायः। आऽकाय्यस्य। दावने। पुरुऽक्षोः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
हे (मघवन्) श्रेष्ठ धनयुक्त (इन्द्र) उत्तम गुणों के धारण करनेवाले राजन् ! (त्वोतासः) आप से रक्षा और वृद्धि को प्राप्त (भेजानासः) सेवन और (गृणन्तः) स्तुति करते हुए (विप्राः) बुद्धिमान् (सूरयः) प्रकाशित विद्यावाले (वयम्) हम लोग (बृहद्दिवस्य) प्रकाशमान (आकाय्यस्य) सब प्रकार शरीर में उत्पन्न (पुरुक्षोः) बहुत अन्नादि से युक्त (ते) आपके (रायः) धन के और (दावने) देनेवाले के लिये स्थिर (स्याम) होवें ॥५॥
Essence
हे राजन् ! जो आप हम लोगों की सब प्रकार से रक्षा करें तो हम लोग अति उन्नतियुक्त होवें ॥५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के गुणों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥५॥ यह उनत्तीसवाँ सूक्त और अठारहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब प्रजागुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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