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Rigveda Mandal 4 / Sukta 28 / Mantra 5

58 Sukta
5 Mantra
4/28/5
Devata- इन्द्रासोमौ Rishi- वामदेवः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वा स॒त्यं म॑घवाना यु॒वं तदिन्द्र॑श्च सोमो॒र्वमश्व्यं॒ गोः। आद॑र्दृत॒मपि॑हिता॒न्यश्ना॑ रिरि॒चथुः॒ क्षाश्चि॑त्ततृदा॒ना ॥५॥

ए॒व । स॒त्यम् । म॒घ॒वा॒ना॒ । यु॒वम् । तत् । इन्द्रः॑ । च॒ । सो॒म॒ । ऊ॒र्वम् । अश्व्य॑म् । गोः । आ । अ॒द॒र्दृ॒त॒म् । अपि॑ऽहितानि । अश्ना॑ । रि॒रि॒चथुः॑ । क्षाः । चि॒त् । त॒तृ॒दा॒ना ॥

Mantra without Swara
एवा सत्यं मघवाना युवं तदिन्द्रश्च सोमोर्वमश्व्यं गोः। आदर्दृतमपिहितान्यश्ना रिरिचथुः क्षाश्चित्ततृदाना ॥

एव। सत्यम्। मघऽवाना। युवम्। तत्। इन्द्रः। च। सोम। ऊर्वम्। अश्व्यम्। गोः। आ। अदर्दृतम्। अपिऽहितानि। अश्ना। रिरिचथुः। क्षाः। चित्। ततृदाना ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) उत्तम गुणों से युक्त (मघवाना) बहुत धनों से युक्त राजा और प्रजाजनो (युवम्) आप दोनों जो (सत्यम्) सत्य (गोः) पृथिवी का (ऊर्वम्) ढाँपनेवाला (अश्व्यम्) घोड़ों में उत्पन्न हुए को प्राप्त होकर शत्रुओं को (आ, अदर्दृतम्) निरन्तर नाश करो (तत्) उसको (इन्द्रः) राजा ग्रहण करके शत्रुओं का नाश करे और जिन (अपिहितानि) घिरे हुए (अश्ना) भोग करने योग्य पदार्थों को (रिरिचथुः) छोड़ो (क्षाः, च) पृथिवियों को (चित्) भी छोड़ो, उनको प्राप्त होकर दुष्ट संबन्धी (ततृदाना) दुःख के नाश करनेवाले होवें, इस प्रकार से (एव) ऐसे ही राजा भी होवे ॥५॥
Essence
जो राजा, मन्त्री, सेना और प्रजाजन परस्पर में स्नेह करके राज्य शिक्षा करें तो इनका कोई भी शत्रु नहीं उपस्थित हो ॥५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजादि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥५॥ यह अट्ठाईसवाँ सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर राजप्रजा के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥