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Rigveda Mandal 4 / Sukta 28 / Mantra 1

58 Sukta
5 Mantra
4/28/1
Devata- इन्द्रासोमौ Rishi- वामदेवः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वा यु॒जा तव॒ तत्सो॑म स॒ख्य इन्द्रो॑ अ॒पो मन॑वे स॒स्रुत॑स्कः। अह॒न्नहि॒मरि॑णात्स॒प्त सिन्धू॒नपा॑वृणो॒दपि॑हितेव॒ खानि॑ ॥१॥

त्वा । यु॒जा । तव॑ । तत् । सो॒म॒ । स॒ख्ये । इन्द्रः॑ । अ॒पः । मन॑वे । स॒ऽस्रुतः॑ । क॒रिति॑ कः । अह॒न् । अहि॑म् । अरि॑णात् । स॒प्त । सिन्धू॑न् । अप॑ । अ॒वृ॒णो॒त् । अपि॑हिताऽइव । खानि॑ ॥

Mantra without Swara
त्वा युजा तव तत्सोम सख्य इन्द्रो अपो मनवे सस्रुतस्कः। अहन्नहिमरिणात्सप्त सिन्धूनपावृणोदपिहितेव खानि ॥

त्वा। युजा। तव। तत्। सोम। सख्ये। इन्द्रः। अपः। मनवे। सऽस्रुतः। करिति कः। अहन्। अहिम्। अरिणात्। सप्त। सिन्धून्। अप। अवृणोत्। अपिहिताऽइव। खानि ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्य्य से युक्त (तव) आपकी (सख्ये) मित्रता के लिये जैसे (इन्द्रः) सूर्य्य के सदृश राजा (मनवे) मनुष्य के लिये (सस्रुतः) चलनेवालों को (कः) करता (अहिम्) मेघ का (अहन्) नाश करता (सप्त) सात (सिन्धून्) नदियों को (अरिणात्) प्रेरित करता और (खानि) इन्द्रियाँ (अपिहितेव) घिरी हुईं सी (अपः) जलों को (अप, अवृणोत्) घेरती हैं, वैसे (तत्) वह (त्वा) आपको (युजा) युक्त पुरुष के साथ कर्म करने योग्य हो सकता है ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य सब के सुख के लिये वर्षा करके सब को आनन्द देता है, वैसे ही विद्वानों की मित्रता सब को आनन्द देनेवाली है, यह जानना चाहिये ॥१॥
Subject
अब पाँच ऋचावाले अट्ठाईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य सूर्य्यदृष्टान्त से राजप्रजागुणों का उपदेश करते हैं ॥

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