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Rigveda Mandal 4 / Sukta 27 / Mantra 5

58 Sukta
5 Mantra
4/27/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृच्छक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अध॑ श्वे॒तं क॒लशं॒ गोभि॑र॒क्तमा॑पिप्या॒नं म॒घवा॑ शु॒क्रमन्धः॑। अ॒ध्व॒र्युभिः॒ प्रय॑तं॒ मध्वो॒ अग्र॒मिन्द्रो॒ मदा॑य॒ प्रति॑ ध॒त्पिब॑ध्यै॒ शूरो॒ मदा॑य॒ प्रति॑ ध॒त्पिब॑ध्यै ॥५॥

अध॑ । श्वे॒तम् । क॒लश॑म् । गोभिः॑ । अ॒क्तम् । आ॒ऽपि॒प्या॒नम् । म॒घऽवा॑ । शु॒क्रम् । अन्धः॑ । अ॒ध्व॒र्युऽभिः॑ । प्रऽय॑तम् । मध्वः॑ । अग्र॑म् । इन्द्रः॑ । मदा॑य । प्रति॑ । ध॒त् । पिब॑ध्यै । शूरः॑ । मदा॑य । प्रति॑ । ध॒त् । पिब॑ध्यै ॥

Mantra without Swara
अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तमापिप्यानं मघवा शुक्रमन्धः। अध्वर्युभिः प्रयतं मध्वो अग्रमिन्द्रो मदाय प्रति धत्पिबध्यै शूरो मदाय प्रति धत्पिबध्यै ॥

अध। श्वेतम्। कलशम्। गोभिः। अक्तम्। आऽपिप्यानम्। मघऽवा। शुक्रम्। अन्धः। अध्वर्युऽभिः। प्रऽयतम्। मध्वः। अग्रम्। इन्द्रः। मदाय। प्रति। धत्। पिबध्यै। शूरः। मदाय। प्रति। धत्। पिबध्यै ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (मघवा) बहुत श्रेष्ठ धनयुक्त (गोभिः) गौओं से (अक्तम्) सम्बद्ध (आपिप्यानम्) बढ़े हुए (श्वेतम्) श्वेत वर्णवाले (कलशम्) घड़े (शुक्रम्) जल और (अन्धः) अन्न को (पिबध्यै) पीने के लिये (मदाय) आनन्द के लिये (प्रति, धत्) धारण करता है (अध) और जो (शूरः) भय से रहित (इन्द्रः) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाला (मदाय) आनन्द के लिये (अध्वर्य्युभिः) अपने नहीं नाश होने की इच्छा करनेवालों के साथ (मध्वः) मधुर आदि गुणों के (अग्रम्) प्रथम (प्रयतम्) प्रयत्न से सिद्ध करने योग्य आनन्द के लिये (पिबध्यै) पीने को (प्रति, धत्) धारण करता है, वह नहीं नष्ट होनेवाले बल को प्राप्त होता है ॥५॥
Essence
जो नियमित आहार और विहार करने और नहीं हिंसा करनेवाले शूरवीर होवें, वे सदा विजय को प्राप्त होवें ॥५॥ इस सूक्त में जीव के गुणों के वर्णन होने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥५॥ यह सत्ताईसवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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