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Rigveda Mandal 4 / Sukta 27 / Mantra 3

58 Sukta
5 Mantra
4/27/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अव॒ यच्छ्ये॒नो अस्व॑नी॒दध॒ द्योर्वि यद्यदि॒ वात॑ ऊ॒हुः पुर॑न्धिम्। सृ॒जद्यद॑स्मा॒ अव॑ ह क्षि॒पज्ज्यां कृ॒शानु॒रस्ता॒ मन॑सा भुर॒ण्यन् ॥३॥

अव॑ । यत् । श्ये॒नः । अस्व॑नीत् । अध॑ । द्योः । वि । यत् । यदि॑ । वा॒ । अतः॑ । ऊ॒हुः । पुर॑म्ऽधिम् । सृ॒जत् । यत् । अ॒स्मै॒ । अव॑ । ह॒ । क्षि॒पत् । ज्याम् । कृ॒शानुः॑ । अस्ता॑ । मन॑सा । भु॒र॒ण्यन् ॥

Mantra without Swara
अव यच्छ्येनो अस्वनीदध द्योर्वि यद्यदि वात ऊहुः पुरन्धिम्। सृजद्यदस्मा अव ह क्षिपज्ज्यां कृशानुरस्ता मनसा भुरण्यन् ॥

अव। यत्। श्येनः। अस्वनीत्। अध। द्योः। वि। यत्। यदि। वा। अतः। ऊहुः। पुरम्ऽधिम्। सृजत्। यत्। अस्मै। अव। ह। क्षिपत्। ज्याम्। कृशानुः। अस्ता। मनसा। भुरण्यन् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (श्येनः) वाज पक्षी के सदृश वर्त्तमान (अव, अस्वनीत्) शब्द करे उपदेश देवे (अध) इसके अनन्तर (यत्) जो (द्योः) प्रकाश के सम्बन्ध में (पुरन्धिम्) बहुत धारण करनेवाले राजा को (सृजत्) उत्पन्न करे (यत्, वा) अथवा जो शत्रुबल को कम्पावे (अस्मै,ह) इसी के लिये (ज्याम्) धनुष् की ताँत की (अव, क्षिपत्) प्रेरणा देता है (अतः) इस कारण (कृशानुः) शत्रुओं को खींचनेवाला जैसे वैसे (मनसा) अन्तःकरण से (भुरण्यन्) पदार्थों का धारण वा पोषण करता हुआ (अस्ता) फेंकनेवाला (वि) विशेष करके फेंकता है (यदि) जो उसको अन्य जन (ऊहुः) पहुँचाते हैं तो वह सब स्थान में विजयी होवे ॥३॥
Essence
जो मनुष्य सत्य के उपदेश करने, सत्य न्याय करने, शत्रुओं के जीतने और प्रजा के पालन करनेवाले राजा को प्राप्त होवें, वे सब प्रकार से सुखी होवें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥