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Rigveda Mandal 4 / Sukta 27 / Mantra 2

58 Sukta
5 Mantra
4/27/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न घा॒ स मामप॒ जोषं॑ जभारा॒भीमा॑स॒ त्वक्ष॑सा वी॒र्ये॑ण। ई॒र्मा पुर॑न्धिरजहा॒दरा॑तीरु॒त वाताँ॑ अतर॒च्छूशु॑वानः ॥२॥

न । घ॒ । सः । माम् । अप॑ । जोष॑म् । ज॒भा॒र॒ । अ॒भि । ई॒म् । आ॒स॒ । त्वक्ष॑सा । वी॒र्ये॑ण । ई॒र्मा । पुर॑म्ऽधिः । अ॒ज॒हा॒त् । अरा॑तीः । उ॒त । वाता॑न् । अ॒त॒र॒त् । शूशु॑वानः ॥

Mantra without Swara
न घा स मामप जोषं जभाराभीमास त्वक्षसा वीर्येण। ईर्मा पुरन्धिरजहादरातीरुत वाताँ अतरच्छूशुवानः ॥

न। घ। सः। माम्। अप। जोषम्। जभार। अभि। ईम्। आस। त्वक्षसा। वीर्येण। ईर्मा। पुरम्ऽधिः। अजहात्। अरातीः। उत। वातान्। अतरत्। शूशुवानः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जो (शूशुवानः) बढ़ने (पुरन्धिः) बहुत पदार्थों को धारण करने और (ईर्मा) प्रेरणा करनेवाला (त्वक्षसा) तीव्र (वीर्य्येण) बल से (वातान्) वायु के सदृश वेगयुक्त पदार्थों के समान (अरातीः) शत्रुओं का (अजहात्) त्याग करे (उत) और शत्रुओं के बल के (अतरत्) पार होवे (सः, घा) वही (माम्) मेरे (अप, जोषम्) विपरीत सेवन को (न) नहीं (जभार) धारण करे, इससे मैं (ईम्) सब प्रकार सुखयुक्त (अभि, आस) सब ओर से होऊँ ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य वायु के सदृश बलवान् होकर शत्रुओं को दबाते हैं, वे दुःख को लाँघ और और बुरे कर्म को त्याग के सुखी होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥