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Rigveda Mandal 4 / Sukta 26 / Mantra 7

58 Sukta
7 Mantra
4/26/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ॒दाय॑ श्ये॒नो अ॑भर॒त्सोमं॑ स॒हस्रं॑ स॒वाँ अ॒युतं॑ च सा॒कम्। अत्रा॒ पुर॑न्धिरजहा॒दरा॑ती॒र्मदे॒ सोम॑स्य मू॒रा अमू॑रः ॥७॥

आ॒ऽदाय॑ । श्ये॒नः । अ॒भ॒र॒त् । सोम॑म् । स॒हस्र॑म् । स॒वान् । अ॒युत॑म् । च॒ । सा॒कम् । अत्र॑ । पुर॑म्ऽधिः । अ॒ज॒हा॒त् । अरा॑तीः । मदे॑ । सोम॑स्य । मू॒राः । अमू॑रः ॥

Mantra without Swara
आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं च साकम्। अत्रा पुरन्धिरजहादरातीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः ॥

आऽदाय। श्येनः। अभरत्। सोमम्। सहस्रम्। सवान्। अयुतम्। च। साकम्। अत्र। पुरम्ऽधिः। अजहात्। अरातीः। मदे। सोमस्य। मूराः। अमूरः ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
जो सेना का स्वामी (श्येनः) वाज नामक पक्षी के सदृश (सहस्रम्) सहस्र संख्यायुक्त (सोमम्) ऐश्वर्य्य वा ओषधि आदि पदार्थ (च) और (अयुतम्) असंख्य (सवान्) उत्पन्न हुए पदार्थों को (आदाय) ग्रहण करके सेना और राज्य को (अभरत्) धारण करे वह (अमूरः) निर्मोह जन (अत्रा) इस में (पुरन्धिः) पुर को धारण करनेवाला (सोमस्य) ऐश्वर्य्य सम्बन्धी (मदे) आनन्द के निमित्त (मूराः) मूढ़ (अरातीः) शत्रुओं का (अजहात्) त्याग करता है, वह इसमें (साकम्) साथ ही विजय को प्राप्त होवे ॥७॥
Essence
जो शत्रु के बल से अधिक बल, शत्रु की सामग्री से सैकड़ों गुणी अधिक सामग्री, उत्तम प्रकार शिक्षायुक्त सेना और विद्वानों को अध्यक्ष करके युद्ध करें, वे निश्चय विजय को प्राप्त होवें ॥७॥ इस सूक्त में ईश्वर और राजसेना के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥७॥ यह छब्बीसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर प्रकारान्तर से पूर्वोक्त विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥