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Rigveda Mandal 4 / Sukta 26 / Mantra 5

58 Sukta
7 Mantra
4/26/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भर॒द्यदि॒ विरतो॒ वेवि॑जानः प॒थोरुणा॒ मनो॑जवा असर्जि। तूयं॑ ययौ॒ मधु॑ना सो॒म्येनो॒त श्रवो॑ विविदे श्ये॒नो अत्र॑ ॥५॥

भर॑त् । यदि॑ । विः । अतः॑ । वेवि॑जानः । प॒था । उ॒रुणा॑ । मनः॑ऽजवाः । अ॒स॒र्जि॒ । तूय॑म् । य॒यौ॒ । मधु॑ना । सो॒म्येन॑ । उ॒त । श्रवः॑ । वि॒वि॒दे॒ । श्ये॒नः । अत्र॑ ॥

Mantra without Swara
भरद्यदि विरतो वेविजानः पथोरुणा मनोजवा असर्जि। तूयं ययौ मधुना सोम्येनोत श्रवो विविदे श्येनो अत्र ॥

भरत्। यदि। विः। अतः। वेविजानः। पथा। उरुणा। मनःऽजवाः। असर्जि। तूयम्। ययौ। मधुना। सोम्येन। उत। श्रवः। विविदे। श्येनः। अत्र ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजजनो ! (यदि) जो (अत्र) इस संसार में आप लोगों से (मनोजवाः) मन के सदृश वेगयुक्त सेनाओं को (असर्जि) बनाता है तो (अतः) इस स्थान से जैसे (श्येनः) हिंसा करनेवाला वेगयुक्त (विः) पक्षी (वेविजानः) कम्पता हुआ (उरुणा) बहुत (पथा) मार्ग से (तूयम्) शीघ्र (ययौ) जाता है, वैसे जो राजा (मधुना) मधुर (सोम्येन) सोम अर्थात् ओषधियों में उत्पन्न हुए रस से (श्रवः) अन्न आदि को (उत) और सेना को (भरत्) पुष्ट करे, वह विजय को (विविदे) प्राप्त होता है ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजजनो ! आप लोग जब तक वाजपक्षी के सदृश वेग युक्त सेना को नहीं करते हैं, तब तक विजय से धन का लाभ नहीं हो सकता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥