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Rigveda Mandal 4 / Sukta 25 / Mantra 6

58 Sukta
8 Mantra
4/25/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सु॒प्रा॒व्यः॑ प्राशु॒षाळे॒ष वी॒रः सुष्वेः॑ प॒क्तिं कृ॑णुते॒ केव॒लेन्द्रः॑। नासु॑ष्वेरा॒पिर्न सखा॒ न जा॒मिर्दु॑ष्प्रा॒व्यो॑ऽवह॒न्तेदवा॑चः ॥६॥

सु॒प्र॒ऽअ॒व्यः॑ । प्रा॒शु॒षाट् । ए॒षः । वी॒रः । सुस्वेः॑ । प॒क्तिम् । कृ॒णु॒ते॒ । केव॑ला । इन्द्रः॑ । न । असु॑स्वेः । आ॒पिः । न । सखा॑ । न । जा॒मिः । दुः॒प्र॒ऽअ॒व्यः॑ । अ॒व॒ऽह॒न्ता । इत् । अवा॑चः ॥

Mantra without Swara
सुप्राव्यः प्राशुषाळेष वीरः सुष्वेः पक्तिं कृणुते केवलेन्द्रः। नासुष्वेरापिर्न सखा न जामिर्दुष्प्राव्योऽवहन्तेदवाचः ॥

सुप्रऽअव्यः। प्राशुषाट्। एषः। वीरः। सुस्वेः। पक्तिम्। कृणुते। केवला। इन्द्रः। न। असुस्वेः। आपिः। न। सखा। न। जामिः। दुःप्रऽअव्यः। अवहन्ता। इत्। अवाचः ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 14 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सुप्राव्यः) उत्तम प्रकार रक्षा करने योग्य (प्राशुषाट्) वेगयुक्त शत्रुओं को सहनेवाला (एषः) यह (वीरः) बलिष्ठ (इन्द्रः) ऐश्वर्य्ययुक्त जन (सुष्वेः) उत्तम प्रकार उत्पन्न अन्न के (केवला) केवल (पक्तिम्) पाक को (कृणुते) करता है और जो (असुष्वेः) आलस्य भरे हुए अर्थात् नहीं उत्पन्न करनेवाले के सम्बन्ध में (आपिः) सब को प्राप्त होनेवाले के (न) सदृश वा (सखा) मित्र के (न) सदृश (जामिः) बन्धु (दुष्प्राव्यः) दुःख से रक्षा करने योग्य और (अवाचः) दुष्ट वचनवाले के (अवहन्ता) विरुद्ध काम का हनन करनेवाला (इत्) ही विरोध को (न) नहीं करता है, वही सब का सुखदाता होता है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजपुरुष उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न का भोग तथा मित्र और बन्धुओं के सदृश वर्त्ताव करके दुष्ट स्वभाववालों का नाश करते, वे दारिद्र्य और पराजय को नहीं प्राप्त होते हैं ॥६॥
Subject
अब राजा अमात्यादिकों के गुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥