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Rigveda Mandal 4 / Sukta 25 / Mantra 5

58 Sukta
8 Mantra
4/25/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न तं जि॑नन्ति ब॒हवो॒ न द॒भ्रा उ॒र्व॑स्मा॒ अदि॑तिः॒ शर्म॑ यंसत्। प्रि॒यः सु॒कृत्प्रि॒य इन्द्रे॑ मना॒युः प्रि॒यः सु॑प्रा॒वीः प्रि॒यो अ॑स्य सो॒मी ॥५॥

न । तम् । जि॒न॒न्ति॒ । ब॒हवः॑ । न । द॒भ्राः । उ॒रु । अ॒स्मै॒ । अदि॑तिः । शर्म॑ । यं॒स॒त् । प्रि॒यः । सु॒ऽकृत् । प्रि॒यः । इन्द्रे॑ । म॒ना॒युः । प्रि॒यः । सु॒प्र॒ऽअ॒वीः । प्रि॒यः । अ॒स्य॒ । सो॒मी ॥

Mantra without Swara
न तं जिनन्ति बहवो न दभ्रा उर्वस्मा अदितिः शर्म यंसत्। प्रियः सुकृत्प्रिय इन्द्रे मनायुः प्रियः सुप्रावीः प्रियो अस्य सोमी ॥

न। तम्। जिनन्ति। बहवः। न। दभ्राः। उरु। अस्मै। अदितिः। शर्म। यंसत्। प्रियः। सुऽकृत्। प्रियः। इन्द्रे। मनायुः। प्रियः। सुप्रऽअवीः। प्रियः। अस्य। सोमी ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रे) अत्यन्त ऐश्वर्य्य होने पर (प्रियः) अन्यों को प्रसन्न करने (सुकृत्) सत्य कर्म्म करने, जनों में (प्रियः) प्रीति करने और प्रियों में (मनायुः) मन के सदृश आचरण करनेवाला धर्म्मयुक्त कर्म्म से (प्रियः) आनन्द और शोक से रहित विद्याओं में (सुप्रावीः) अच्छे प्रकार उत्तम गुणों को प्राप्त विद्वानों में (प्रियः) सुन्दर और (अस्य) इस जगत् के मध्य में (सोमी) अनेक प्रकार के ऐश्वर्य्य से युक्त है (तम्) उसको शत्रु लोग (न) नहीं (जिनन्ति) जीतते हैं (बहवः) अनेक (दभ्राः) नाश करनेवाले (न) नहीं नाश करते हैं (अस्मै) इसके लिये (अदितिः) माता (उरु) बहुत (शर्म्म) सुख को (यंसत्) देती है ॥५॥
Essence
जो शत्रुरहित परमेश्वर की उपासना करने और सब के प्रिय साधनेवाले जन होते हैं, उनको कोई भी शत्रु जीत नहीं सकता है और जैसे माता वा श्रेष्ठ गृह को प्राप्त होकर मनुष्य सुख का आचरण करता है, वैसे ही सब सुखों को प्राप्त होकर निरन्तर आनन्दित होता है ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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