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Rigveda Mandal 4 / Sukta 25 / Mantra 3

58 Sukta
8 Mantra
4/25/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
को दे॒वाना॒मवो॑ अ॒द्या वृ॑णीते॒ क आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं॒ ज्योति॑रीट्टे। कस्या॒श्विना॒विन्द्रो॑ अ॒ग्निः सु॒तस्यां॒शोः पि॑बन्ति॒ मन॒सावि॑वेनम् ॥३॥

कः । दे॒वाना॑म् । अवः॑ । अ॒द्य । वृ॒णी॒ते॒ । कः । आ॒दि॒त्यान् । अदि॑तिम् । ज्योतिः॑ । ई॒ट्टे॒ । कस्य॑ । अ॒श्विनौ॑ । इन्द्रः॑ । अ॒ग्निः । सु॒तस्य॑ । अं॒शोः । पि॒ब॒न्ति॒ । मन॑सा । अवि॑ऽवेनम् ॥

Mantra without Swara
को देवानामवो अद्या वृणीते क आदित्याँ अदितिं ज्योतिरीट्टे। कस्याश्विनाविन्द्रो अग्निः सुतस्यांशोः पिबन्ति मनसाविवेनम् ॥

कः। देवानाम्। अवः। अद्य। वृणीते। कः। आदित्यान्। अदितिम्। ज्योतिः। ईट्टे। कस्य। अश्विनौ। इन्द्रः। अग्निः। सुतस्य। अंशोः। पिबन्ति। मनसा। अविऽवेनम् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (कः) कौन (अद्य) आज (देवानाम्) विद्वानों के (अवः) रक्षण आदि का (वृणीते) स्वीकार करता है (कः) कौन (आदित्यान्) मासों के सदृश वर्त्तमान पूर्ण विद्वानों तथा (अदितिम्) पृथिवी और (ज्योतिः) प्रकाश की (ईट्टे) अधिक इच्छा करता है (कस्य) किस (सुतस्य) उत्पन्न (अंशोः) प्राप्त होने योग्य बड़ी औषध के रस के (मनसा) विज्ञान से (अविवेनम्) दुष्ट कामनाओं से रहित जैसे हो, वैसे (अश्विनौ) अन्तरिक्ष-पृथिवी (इन्द्रः) सूर्य्य और (अग्निः) बिजुली वा प्रसिद्धरूप अग्निरस को (पिबन्ति) पीते हैं ॥३॥
Essence
जो विद्वानों के सङ्ग को करते हैं, वे सूर्य आदि के सदृश सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करा सकते हैं और जो नहीं कामना करने योग्य वस्तु की नहीं कामना करते हैं, वे कामनाओं की सिद्धि से युक्त होते हैं, यह उत्तर है ॥३॥
Subject
अब उत्तम, मध्यम और निकृष्टों को कर्त्तव्यकर्मविषय का उपदेश अगले मन्त्र में दिया है ॥