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Rigveda Mandal 4 / Sukta 25 / Mantra 2

58 Sukta
8 Mantra
4/25/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
को ना॑नाम॒ वच॑सा सो॒म्याय॑ मना॒युर्वा॑ भवति॒ वस्त॑ उ॒स्राः। क इन्द्र॑स्य॒ युज्यं॒ कः स॑खि॒त्वं को भ्रा॒त्रं व॑ष्टि क॒वये॒ क ऊ॒ती ॥२॥

कः । न॒ना॒म॒ । वच॑सा । सो॒म्याय॑ । म॒ना॒युः । वा॒ । भ॒व॒ति॒ । वस्ते॑ । उ॒स्राः । कः । इन्द्र॑स्य । युज्य॑म् । कः । स॒खि॒ऽत्वम् । कः । भ्रा॒त्रम् । व॒ष्टि॒ । क॒वये॑ । कः । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
को नानाम वचसा सोम्याय मनायुर्वा भवति वस्त उस्राः। क इन्द्रस्य युज्यं कः सखित्वं को भ्रात्रं वष्टि कवये क ऊती ॥

कः। ननाम। वचसा। सोम्याय। मनायुः। वा। भवति। वस्ते। उस्राः। कः। इन्द्रस्य। युज्यम्। कः। सखिऽत्वम्। कः। भ्रात्रम्। वष्टि। कवये। कः। ऊती ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 2

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Meaning
हे विद्वानो ! (कः) कौन (वचसा) वचन से (सोम्याय) सोमरूप ऐश्वर्य्य की सिद्धि करनेवाले के लिये (नानाम) नम्र होता है (कः, वा) अथवा कौन वचन से सोमरूप ऐश्वर्य्य की सिद्धि करनेवाले के लिये (मनायुः) विज्ञान की कामना करता हुआ (भवति) होता है (कः) कौन (उस्राः) किरणों के सदृश सब को गुणों से (वस्ते) चाहता है (कः) कौन (इन्द्रस्य) ऐश्वर्य्ययुक्त के (युज्यम्) जोड़ने योग्य (सखित्वम्) मित्रपने को (कः) अथवा कौन (कवये) बुद्धिमान् के लिये (ऊती) रक्षण आदि कर्म्म से (भ्रात्रम्) भ्रातृपने की (वष्टि) कामना करता है, इस का उत्तर कहो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मन, कर्म्म और वचन से नम्र होता है, जो किरणों के तुल्य प्रकाशस्वरूप व्यवहारयुक्त, जो जगदीश्वर के साथ मित्रता करता तथा सबके साथ भ्रातृपन की रक्षा करता और जो विद्वानों के लिये हित करता है, वही सम्पूर्ण इष्टफल को प्राप्त होता है ॥२॥
Subject
अब राजकर्त्तव्यविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥