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Rigveda Mandal 4 / Sukta 25 / Mantra 1

58 Sukta
8 Mantra
4/25/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
को अ॒द्य नर्यो॑ दे॒वका॑म उ॒शन्निन्द्र॑स्य स॒ख्यं जु॑जोष। को वा॑ म॒हेऽव॑से॒ पार्या॑य॒ समि॑द्धे अ॒ग्नौ सु॒तसो॑म ईट्टे ॥१॥

कः । अ॒द्य । नर्यः॑ । दे॒वऽका॑मः । उ॒शन् । इन्द्र॑स्य । स॒ख्यम् । जु॒जो॒ष॒ । कः । वा॒ । म॒हे । अव॑से । पार्या॑य । सम्ऽइ॑द्धे । अ॒ग्नौ । सु॒तऽसो॑मः । ई॒ट्टे॒ ॥

Mantra without Swara
को अद्य नर्यो देवकाम उशन्निन्द्रस्य सख्यं जुजोष। को वा महेऽवसे पार्याय समिद्धे अग्नौ सुतसोम ईट्टे ॥

कः। अद्य। नर्यः। देवऽकामः। उशन्। इन्द्रस्य। सख्यम्। जुजोष। कः। वा। महे। अवसे। पार्याय। सम्ऽइद्धे। अग्नौ। सुतऽसोमः। ईट्टे ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 13 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (अद्य) इस समय (कः) कौन (देवकामः) विद्वानों की कामना करनेवाला (इन्द्रस्य) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त के (सख्यम्) मित्रत्व की (उशन्) कामना करता हुआ (नर्य्यः) मनुष्यों में श्रेष्ठ धर्म्म का (जुजोष) सेवन करता है (कः, वा) अथवा कौन (महे) बड़े (पार्य्याय) दुःख के पार उतारनेवाले (अवसे) रक्षण आदि के लिये (समिद्धे) प्रसिद्ध (अग्नौ) अग्नि में (सुतसोमः) सोमरस को उत्पन्न करनेवाला हुआ ऐश्वर्य्य को (ईट्टे) प्राप्त होता है, यह हम लोग पूछते हैं ॥१॥
Essence
जो विद्या और मित्रता की कामना करनेवाला, सम्पूर्ण जगत् का प्रिय आचरण करता और सब का रक्षण करता हुआ अग्नि में होम आदि से प्रजा का हित करे, वही जगत् का हित चाहनेवाला है, यह उत्तर है ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले पच्चीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में प्रश्नोत्तरविषय का आरम्भ किया जाता है ॥