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Rigveda Mandal 4 / Sukta 24 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/24/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य॒दा स॑म॒र्यं व्यचे॒दृघा॑वा दी॒र्घं यदा॒जिम॒भ्यख्य॑द॒र्यः। अचि॑क्रद॒द्वृष॑णं॒ पत्न्यच्छा॑ दुरो॒ण आ निशि॑तं सोम॒सुद्भिः॑ ॥८॥

य॒दा । स॒ऽम॒र्यम् । वि । अचे॑त् । ऋघा॑वा । दी॒र्घम् । यत् । आ॒जिम् । अ॒भि । अख्य॑त् । अ॒र्यः । अचि॑क्रदत् । वृष॑णम् । पत्नी॑ । अच्छ॑ । दु॒रो॒णे । आ । निऽशि॑तम् । सो॒म॒सुत्ऽभिः॑ ॥

Mantra without Swara
यदा समर्यं व्यचेदृघावा दीर्घं यदाजिमभ्यख्यदर्यः। अचिक्रदद्वृषणं पत्न्यच्छा दुरोण आ निशितं सोमसुद्भिः ॥

यदा। सऽमर्यम्। वि। अचेत्। ऋघावा। दीर्घम्। यत्। आजिम्। अभि। अख्यत्। अर्यः। अचिक्रदत्। वृषणम्। पत्नी। अच्छ। दुरोणे। आ। निऽशितम्। सोमसुत्ऽभिः ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यदा) जिस काल में (अर्य्यः) स्वामी ईश्वर अर्थात् राजा (समर्य्यम्) सङ्ग्राम को (वि, अचेत्) चेतन कराता है (यत्) जो (ऋघावा) शत्रुओं का नाश करनेवाला (दीर्घम्) लम्बे बहुत (आजिम्) फेंकते हैं शस्त्र जिसमें उस सङ्ग्राम की (अभि, अख्यत्) प्रसिद्धि करावे और (वृषणम्) बलिष्ठ के प्रति (अचिक्रदत्) अत्यन्त चिल्लाता है, तब (दुरोणे) गृह में (पत्नी) स्त्री के सदृश (सोमसुद्भिः) ऐश्वर्य्य वा ओषधियों के समूह को उत्पन्न करनेवालों के साथ (आ, निशितम्) अच्छे प्रकार निरन्तर तीक्ष्ण (अच्छा) अच्छा अत्यन्त शब्द करता है ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता स्त्री सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों की उत्तम प्रकार रक्षा और उन्नति करके पति आदि को आनन्द देती है, वैसे ही विद्या और विनययुक्त राजा अपने प्रजाजनों की अच्छे प्रकार रक्षा और ऐश्वर्य्य की वृद्धि करके सब सज्जनों की रक्षा करता है ॥८॥
Subject
अब शत्रुओं के विजय से राज्यादि पदार्थों के रक्षण विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥