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Rigveda Mandal 4 / Sukta 24 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/24/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
क इ॒मं द॒शभि॒र्ममेन्द्रं॑ क्रीणाति धे॒नुभिः॑। य॒दा वृ॒त्राणि॒ जङ्घ॑न॒दथै॑नं मे॒ पुन॑र्ददत् ॥१०॥

कः । इ॒मम् । द॒शऽभिः॑ । मम॑ । इन्द्र॑म् । क्री॒णा॒ति॒ । धे॒नुऽभिः॑ । य॒दा । वृ॒त्राणि॑ । जङ्घ॑नत् । अथ॑ । ए॒न॒म् । मे॒ । पुनः॑ । द॒द॒त् ॥

Mantra without Swara
क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः। यदा वृत्राणि जङ्घनदथैनं मे पुनर्ददत् ॥

कः। इमम्। दशऽभिः। मम। इन्द्रम्। क्रीणाति। धेनुऽभिः। यदा। वृत्राणि। जङ्घनत्। अथ। एनम्। मे। पुनः। ददत् ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 12 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (कः) कौन (दशभिः) दश अङ्गुलियों और (धेनुभिः) दोहनेवाली गौओं के सदृश वाणियों से (मम) मेरे (इमम्) इस (इन्द्रम्) ऐश्वर्य्य को (क्रीणाति) खरीदता है (यदा) जब जो (वृत्राणि) धनों को (जङ्घनत्) अत्यन्त प्राप्त होता है (अथ) अनन्तर (एनम्) इसको (मे) मेरे लिये (पुनः) फिर (ददत्) देता है, तभी ऐश्वर्य्य बढ़े ॥१०॥
Essence
कौन ऐश्वर्य्य को बढ़ा सके इस प्रश्न का, जो सब प्रकार पुरुषार्थयुक्त, उत्तम प्रकार शिक्षित वाणी से युक्त है, यह उत्तर है, क्योंकि जो आदि में ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवे, वही औरों को देने को योग्य होवे ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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