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Rigveda Mandal 4 / Sukta 24 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/24/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
का सु॑ष्टु॒तिः शव॑सः सू॒नुमिन्द्र॑मर्वाची॒नं राध॑स॒ आ व॑वर्तत्। द॒दिर्हि वी॒रो गृ॑ण॒ते वसू॑नि॒ स गोप॑तिर्नि॒ष्षिधां॑ नो जनासः ॥१॥

का । सु॒ऽस्तु॒तिः । शव॑सः । सू॒नुम् । इन्द्र॑म् । अ॒र्वा॒ची॒नम् । राध॑से । आ । व॒व॒र्त॒त् । द॒दिः । हि । वी॒रः । गृ॒ण॒ते । वसू॑नि । सः । गोऽप॑तिः । निः॒ऽसिधा॑म् । नः॒ । ज॒ना॒सः॒ ॥

Mantra without Swara
का सुष्टुतिः शवसः सूनुमिन्द्रमर्वाचीनं राधस आ ववर्तत्। ददिर्हि वीरो गृणते वसूनि स गोपतिर्निष्षिधां नो जनासः ॥

का। सुऽस्तुतिः। शवसः। सूनुम्। इन्द्रम्। अर्वाचीनम्। राधसे। आ। ववर्तत्। ददिः। हि। वीरः। गृणते। वसूनि। सः। गोऽपतिः। निःऽसिधाम्। नः। जनासः ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जनासः) विद्वान् वीरपुरुषो ! जो (वीरः) विद्या और शौर्य्य आदि गुणों से व्याप्त जन (गृणते) प्रशंसित कर्म्मवान् के लिये (वसूनि) द्रव्यों को (ददिः) देनेवाला वर्त्तमान है (सः) वह (हि) जिससे (निष्षिधाम्) अत्यन्त शासन करनेवालों के मङ्गलाचारों से युक्त (नः) हम लोगों का (गोपतिः) पृथिवीपति अर्थात् राजा हो (का) कौन (सुष्टुतिः) उत्तम प्रशंसा और (शवसः) बहुत बलवान् के (सूनुम्) पुत्र को (अर्वाचीनम्) इस समयवाले युवावस्थायुक्त (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्य के देनेवाले का (आ, ववर्त्तत्) वर्त्ताव करावे और कौन (राधसे) धन और ऐश्वर्य्यवान् के लिये धन के योग का वर्त्ताव करावे ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो पूर्ण ब्रह्मचर्य्य को किये हुए का पुत्र और वह स्वयं भी पूर्ण ब्रह्मचर्य्य और विद्या से युक्त और प्रशंसित आचरण करने और सुख देनेवाला होवे, वह ही आप का और हम लोगों का राजा हो ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले चौबीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में ब्रह्मचर्यवान् के पुत्र की प्रशंसा कहते हैं ॥