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Rigveda Mandal 4 / Sukta 23 / Mantra 9

58 Sukta
11 Mantra
4/23/9
Devata- इन्द्रऋतदेवो वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तस्य॑ दृ॒ळ्हा ध॒रुणा॑नि सन्ति पु॒रूणि॑ च॒न्द्रा वपु॑षे॒ वपूं॑षि। ऋ॒तेन॑ दी॒र्घमि॑षणन्त॒ पृक्ष॑ ऋ॒तेन॒ गाव॑ ऋ॒तमा वि॑वेशुः ॥९॥

ऋ॒तस्य॑ । दृ॒ळ्हा । ध॒रुणा॑नि । स॒न्ति॒ । पु॒रूणि॑ । च॒न्द्रा । वपु॑षे । वपूं॑षि । ऋ॒तेन॑ । दी॒र्घम् । इ॒ष॒ण॒न्त॒ । पृक्षः॑ । ऋ॒तेन॑ । गावः॑ । ऋ॒तम् । आ । वि॒वे॒शुः॒ ॥

Mantra without Swara
ऋतस्य दृळ्हा धरुणानि सन्ति पुरूणि चन्द्रा वपुषे वपूंषि। ऋतेन दीर्घमिषणन्त पृक्ष ऋतेन गाव ऋतमा विवेशुः ॥

ऋतस्य। दृळ्हा। धरुणानि। सन्ति। पुरूणि। चन्द्रा। वपुषे। वपूंषि। ऋतेन। दीर्घम्। इषणन्त। पृक्षः। ऋतेन। गावः। ऋतम्। आ। विवेशुः ॥९॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (ऋतस्य) सत्य धर्म्म के आचरण से ही (दृळ्हा) दृढ़ (धरुणानि) जलों के सदृश शान्त आचार (पुरूणि) बहुत (चन्द्रा) आनन्द देनेवाले सुवर्ण आदि (वपुषे) सुन्दर रूपयुक्त शरीर के लिये (वपूंषि) रूपों को प्राप्त (सन्ति) हैं और (ऋतेन) सत्य आचरण से (पृक्षः) उत्तम प्रकार स्पर्श होने योग्य अन्न आदिक (दीर्घम्) चिरकाल रहनेवाले आयु को (इषणन्त) प्राप्त होते हैं (ऋतेन) सत्य आचरण से (गावः) गौवें जैसे बछड़ों के स्थानों को वैसे उत्तम प्रकार शिक्षित वाणियाँ (ऋतम्) सत्य ब्रह्म को (आ, विवेशुः) प्राप्त होती हैं, ऐसा जानो ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे जल से प्राणधारण, अन्न आदि की उत्पत्ति और सुन्दर और दीर्घ अवस्था होती है, वैसे ही सत्य आचरण से सम्पूर्ण ऐश्वर्य्य, विद्या और बहुत काल पर्य्यन्त जीवन होता है, जिससे निरन्तर सत्य ही का आचरण करो ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥