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Rigveda Mandal 4 / Sukta 23 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/23/8
Devata- इन्द्रऋतदेवो वा Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋ॒तस्य॒ हि शु॒रुधः॒ सन्ति॑ पू॒र्वीर्ऋ॒तस्य॑ धी॒तिर्वृ॑जि॒नानि॑ हन्ति। ऋ॒तस्य॒ श्लोको॑ बधि॒रा त॑तर्द॒ कर्णा॑ बुधा॒नः शु॒चमा॑न आ॒योः ॥८॥

ऋ॒तस्य॑ । हि । शु॒रुऽधः॑ । सन्ति॑ । पू॒र्वीः । ऋ॒तस्य॑ । धी॒तिः । वृ॒जि॒नानि॑ । ह॒न्ति॒ । ऋ॒तस्य॑ । श्लोकः॑ । ब॒धि॒रा । त॒त॒र्द॒ । कर्णा॑ । बु॒धा॒नः । शु॒चमा॑नः । आ॒योः ॥

Mantra without Swara
ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीर्ऋतस्य धीतिर्वृजिनानि हन्ति। ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः ॥

ऋतस्य। हि। शुरुधः। सन्ति। पूर्वीः। ऋतस्य। धीतिः। वृजिनानि। हन्ति। ऋतस्य। श्लोकः। बधिरा। ततर्द। कर्णा। बुधानः। शुचमानः। आयोः ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! जिस (ऋतस्य) सत्य आचार की (पूर्वीः) प्राचीन (शुरुधः) शीघ्र रोकनेवाली अपनी सेना (सन्ति) हैं जिस (ऋतस्य) सत्य की (धीतिः) धारणा करनेवाली बुद्धि (वृजिनानि) बलों को प्राप्त होकर शत्रुओं का (हन्ति) नाश करती है और जिसे (ऋतस्य) सत्य की (श्लोकः) वाणी (बधिरा) बधिर (कर्णा) कर्णों का (ततर्द) नाश करती है और जो अन्य जनों को (बुधानः) जनाता और (शुचमानः) पवित्र होकर पवित्र करता हुआ (आयोः) जीवन के उपायों का उपदेश देता है, उसका (हि) जिससे गुरु के सदृश सत्कार करो ॥८॥
Essence
हे अध्यापक वा राजन् ! जो जितेन्द्रिय दुष्ट आचार के रोकने और सत्य के प्रचार करनेवाले सत्यवाणीयुक्त और बधिर के सदृश वर्त्तमान अज्ञ पुरुषों को बोध देते हुए ब्रह्मचर्य्य आदि उपदेश से अधिक अवस्थावाले करते हुए क्लेश और शत्रुओं के नाश करनेवाले होवें, वे ही अपने आत्मा के सदृश आदर करने योग्य होवें ॥८॥
Subject
अब सत्याचरणोत्तमता विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥८॥