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Rigveda Mandal 4 / Sukta 23 / Mantra 7

58 Sukta
11 Mantra
4/23/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्रुहं॒ जिघां॑सन्ध्व॒रस॑मनि॒न्द्रां तेति॑क्ते ति॒ग्मा तु॒जसे॒ अनी॑का। ऋ॒णा चि॒द्यत्र॑ ऋण॒या न॑ उ॒ग्रो दू॒रे अज्ञा॑ता उ॒षसो॑ बबा॒धे ॥७॥

दुह॑म् । जिघां॑सम् । ध्व॒रस॑म् । अ॒नि॒न्द्राम् । तेति॑क्ते । ति॒ग्मा । तु॒जसे॑ । अनी॑का । ऋ॒णा । चि॒त् । यत्र॑ । ऋ॒ण॒ऽयाः । नः॒ । उ॒ग्रः । दू॒रे । अज्ञा॑ताः । उ॒षसः॑ । ब॒बा॒धे ॥

Mantra without Swara
द्रुहं जिघांसन्ध्वरसमनिन्द्रां तेतिक्ते तिग्मा तुजसे अनीका। ऋणा चिद्यत्र ऋणया न उग्रो दूरे अज्ञाता उषसो बबाधे ॥

दुहम्। जिघांसन्। ध्वरसम्। अनिन्द्राम्। तेतिक्ते। तिग्मा। तुजसे। अनीका। ऋणा। चित्। यत्र। ऋणऽयाः। नः। उग्रः। दूरे। अज्ञाताः। उषसः। बबाधे ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 10 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्र) जहाँ (नः) हम लोगों का जो (उग्रः) तीव्र प्रताप (दूरे) दूर स्थान में (अज्ञाताः) नहीं जानी गई शत्रुओं की सेनाओं को (उषसः) प्रातःकाल से अन्धकार को जैसे सूर्य्य वैसे (बबाधे) विलोता है (ऋणयाः) प्राप्त सेना से (चित्) भी (तुजसे) बल के लिये अथवा शत्रुओं के नाश के लिये (तिग्मा) तीव्र (ऋणा) प्राप्त (अनीका) शत्रुओं से प्राप्त नहीं होने योग्य सैन्यसमूहों को (तेतिक्ते) अत्यन्त तीक्ष्ण करता है (द्रुहम्) द्रोह करने और (ध्वरसम्) हिंसा करनेवाले को (जिघांसन्) नष्ट करने की इच्छा करता हुआ (अनिन्द्राम्) ईश्वरसम्बन्धरहित मार्ग को (बबाधे) विलोता है ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! जो लोग उत्तम प्रकार शिक्षित, श्रेष्ठ, शत्रुओं को शीघ्र पराजय करनेवाली सेनाओं को सिद्ध करें, जिनसे दूर स्थान में भी वर्त्तमान शत्रु लोग डरें, दारिद्र्य और भय को दूरकर अपनी प्रजा को आनन्द देकर दुष्टों का निरन्तर नाश करें, उनका आप सदा ही सत्कार करो ॥७॥
Subject
अब शत्रुनिवारण के अनुकूल सेना की उन्नति के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥