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Rigveda Mandal 4 / Sukta 22 / Mantra 6

58 Sukta
11 Mantra
4/22/6
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ता तू ते॑ स॒त्या तु॑विनृम्ण॒ विश्वा॒ प्र धे॒नवः॑ सिस्रते॒ वृष्ण॒ ऊध्नः॑। अधा॑ ह॒ त्वद्वृ॑षमणो भिया॒नाः प्रसिन्ध॑वो॒ जव॑सा चक्रमन्त ॥६॥

ता । तु । ते॒ । स॒त्या । तु॒वि॒ऽनृ॒म्ण॒ । विश्वा॑ । प्र । धे॒नवः॑ । सि॒स्र॒ते॒ । वृष्णः॑ । ऊध्नः॑ । अध॑ । ह॒ । त्वत् । वृ॒ष॒ऽम॒नः॒ । भि॒या॒नाः । प्र । सिन्ध॑वः । जव॑सा । च॒क्र॒म॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
ता तू ते सत्या तुविनृम्ण विश्वा प्र धेनवः सिस्रते वृष्ण ऊध्नः। अधा ह त्वद्वृषमणो भियानाः प्रसिन्धवो जवसा चक्रमन्त ॥

ता। तु। ते। सत्या। तुविऽनृम्ण। विश्वा। प्र। धेनवः। सिस्रते। वृष्णः। ऊध्नः। अध। ह। त्वत्। वृषऽमनः। भियानाः। प्र। सिन्धवः। जवसा। चक्रमन्त ॥६॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 8 Mantra » 1

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Meaning
हे (तुविनृम्ण) बहुत धनवाले और (वृषमणः) बलयुक्त पुरुष के मन के सदृश मन से युक्त राजन् ! जैसे (सिन्धवः) नदियाँ (जवसा) वेग से (चक्रमन्त) चलती हैं, वैसे (त्वत्) आपके समीप से (भियानाः) भय को प्राप्त शत्रु लोग दूर भागते हैं (अधा) इसके अनन्तर जो (ते) आपके (विश्वा) सम्पूर्ण (सत्या) श्रेष्ठ पुरुषों में साधु कर्म्म अर्थात् उत्तम आचरण और (धेनवः) वाणियाँ (वृष्णः) ब्रह्मचर्य्य आदि से बलिष्ठ (ऊध्नः) विस्तीर्ण बलवालों को (प्र, सिस्रते) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं (ता) उनको (तू) फिर (ह) निश्चय से आप वेग से (प्र) अत्यन्त सिद्ध करो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जिस राजा की सफल वाणी और धर्मयुक्त कर्म्म वर्तमान है, उससे गौओं से बछड़ों के सदृश प्रजा तृप्त होती है और उससे दुष्ट डरते हैं और यश विस्तृत होता है ॥६॥
Subject
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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