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Rigveda Mandal 4 / Sukta 22 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/22/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ता तू त॑ इन्द्र मह॒तो म॒हानि॒ विश्वे॒ष्वित्सव॑नेषु प्र॒वाच्या॑। यच्छू॑र धृष्णो धृष॒ता द॑धृ॒ष्वानहिं॒ वज्रे॑ण॒ शव॒सावि॑वेषीः ॥५॥

ता । तु । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । म॒ह॒तः । म॒हानि॑ । विश्वे॑षु । इत् । सव॑नेषु । प्र॒ऽवाच्या॑ । यत् । शू॒र॒ । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । धृ॒ष॒ता । द॒धृ॒ष्वान् । अहि॑म् । वज्रे॑ण । शव॑सा । अवि॑वेषीः ॥

Mantra without Swara
ता तू त इन्द्र महतो महानि विश्वेष्वित्सवनेषु प्रवाच्या। यच्छूर धृष्णो धृषता दधृष्वानहिं वज्रेण शवसाविवेषीः ॥

ता। तु। ते। इन्द्र। महतः। महानि। विश्वेषु। इत्। सवनेषु। प्रऽवाच्या। यत्। शूर। धृष्णो इति। धृषता। दधृष्वान्। अहिम्। वज्रेण। शवसा। अविवेषीः ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (धृष्णो) अत्यन्त ढीठ (शूर) भयरहित (इन्द्र) परम ऐश्वर्य्य का प्रयोग करनेवाले राजन् ! (यत्) जो (विश्वेषु) सम्पूर्ण (सवनेषु) ऐश्वर्य्य से युक्त लोकों में (महतः) आदर करने योग्य (ते) आपके (महानि) बड़े-बड़े (प्रवाच्या) उत्तमता से कहने योग्य कार्य्य हैं (ता, इत्) उन्हीं को (तू) तो (दधृष्वान्) धारण करते हुए (धृषता) अत्यन्त ढिठाई और (शवसा) बल से (वज्रेण) किरण से (अहिम्) मेघ को सूर्य्य जैसे वैसे शस्त्र और अस्त्र से (अविवेषीः) प्राप्त हूजिये ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य किरणों से आकर्षण करके सम्पूर्ण भूगोलों को धारण करता है, वैसे ही बड़ी सत्पुरुष आदि सामग्री को करके राजा द्वीप और द्वीपान्तरों में स्थित राज्यों को शासन देवे ॥५॥
Subject
अब भूगोल के भ्रमणदृष्टान्त से राजगुणों को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥