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Rigveda Mandal 4 / Sukta 22 / Mantra 3

58 Sukta
11 Mantra
4/22/3
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो दे॒वो दे॒वत॑मो॒ जाय॑मानो म॒हो वाजे॑भिर्म॒हद्भि॑श्च॒ शुष्मैः॑। दधा॑नो॒ वज्रं॑ बा॒ह्वोरु॒शन्तं॒ द्याममे॑न रेजय॒त्प्र भूम॑ ॥३॥

यः । दे॒वः । दे॒वऽत॑मः । जाय॑मानः । म॒हः । वाजे॑भिः । म॒हत्ऽभिः॑ । च॒ । शुष्मैः॑ । दधा॑नः । वज्र॑म् । बा॒ह्वोः । उ॒शन्त॑म् । द्याम् । अमे॑न । रे॒ज॒य॒त् । प्र । भूम॑ ॥

Mantra without Swara
यो देवो देवतमो जायमानो महो वाजेभिर्महद्भिश्च शुष्मैः। दधानो वज्रं बाह्वोरुशन्तं द्याममेन रेजयत्प्र भूम ॥

यः। देवः। देवऽतमः। जायमानः। महः। वाजेभिः। महत्ऽभिः। च। शुष्मैः। दधानः। वज्रम्। बाह्वोः। उशन्तम्। द्याम्। अमेन। रेजयत्। प्र। भूम ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (महद्भिः) बड़े गुणों से विशिष्ट (वाजेभिः) वेगयुक्त सेनाजनों और (शुष्मैः) बलों के साथ (महः) बड़ा (जायमानः) उत्पन्न होता हुआ (देवः) विद्वान् (देवतमः) अत्यन्त विद्वान् राजा (बाह्वोः) भुजाओं के बीच (वज्रम्) शस्त्र और अस्त्र को (दधानः) धारण करता हुआ (अमेन) बल से सूर्य्य (द्याम्) प्रकाश (च) और (भूम) पृथिवी को जैसे (प्र, रेजयत्) कम्पाता है, वैसे (उशन्तम्) कामना करते हुए शत्रु को कम्पाता है, उस हम लोगों के सुख की कामना करते हुए राजा को हम लोग स्वीकार करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो योग्य दण्ड से सूर्य्य, प्रकाश और भूगोलों को कम्पाते हुए के सदृश प्रजाओं को अधर्म्माचरण से कम्पाता है, वही पूर्ण विद्वान् राजा होता है ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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