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Rigveda Mandal 4 / Sukta 22 / Mantra 1

58 Sukta
11 Mantra
4/22/1
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यन्न॒ इन्द्रो॑ जुजु॒षे यच्च॒ वष्टि॒ तन्नो॑ म॒हान्क॑रति शु॒ष्म्या चि॑त्। ब्रह्म॒ स्तोमं॑ म॒घवा॒ सोम॑मु॒क्था यो अश्मा॑नं॒ शव॑सा॒ बिभ्र॒देति॑ ॥१॥

यत् । नः॒ । इन्द्रः॑ । जु॒जु॒षे । यत् । च॒ । व॒ष्टि॒ । तत् । नः॒ । म॒हान् । क॒र॒ति॒ । शु॒ष्मी । आ । चि॒त् । ब्रह्म॑ । स्तोम॑म् । म॒घऽवा॑ । सोम॑म् । उ॒क्था । यः । अश्मा॑नम् । शव॑सा । बिभ्र॑त् । एति॑ ॥

Mantra without Swara
यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च वष्टि तन्नो महान्करति शुष्म्या चित्। ब्रह्म स्तोमं मघवा सोममुक्था यो अश्मानं शवसा बिभ्रदेति ॥

यत्। नः। इन्द्रः। जुजुषे। यत्। च। वष्टि। तत्। नः। महान्। करति। शुष्मी। आ। चित्। ब्रह्म। स्तोमम्। मघऽवा। सोमम्। उक्था। यः। अश्मानम्। शवसा। बिभ्रत्। एति ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 7 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (इन्द्रः) अत्यन्त सुख का देनेवाला राजा (नः) हम लोगों की (जुजुषे) सेवा करता है (यत्, च) और जो (महान्) बड़ा ऐश्वर्यवाला (आ, वष्टि) कामना करता है (यः) जो (शुष्मी) अत्यन्त बलवान् (मघवा) अति उत्तम धनयुक्त राजा सूर्य्य (अश्मानम्) मेघ को जैसे वैसे (शवसा) बल से (ब्रह्म) बहुत धन वा अन्न (स्तोमम्) प्रशंसा करने योग्य (सोमम्) ओषधी आदि पदार्थसमूह से ऐश्वर्य्य और (उक्था) प्रशंसा करने योग्य वस्तुओं को (चित्) भी (बिभ्रत्) धारण करता हुआ राज्य को (एति) प्राप्त होता है (तत्) वह (नः) हम लोगों को सुख (करति) करता है, ऐसा जानो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य मेघ को धारण करता और नाश करता है, वैसे ही जो राजा श्रेष्ठों को धारण करता और दुष्टों को दण्ड देता है, वही हम लोगों के पालन करने योग्य है ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले बाईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ॥