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Rigveda Mandal 4 / Sukta 21 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/21/8
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि यद्वरां॑सि॒ पर्व॑तस्य वृ॒ण्वे पयो॑भिर्जि॒न्वे अ॒पां जवां॑सि। वि॒दद्गौ॒रस्य॑ गव॒यस्य॒ गोहे॒ यदी॒ वाजा॑य सु॒ध्यो॒३॒॑ वह॑न्ति ॥८॥

वि । यत् । वरां॑सि । पर्व॑तस्य । वृ॒ण्वे । पयः॑ऽभिः । जि॒न्वे । अ॒पाम् । जवां॑सि । वि॒दत् । गौ॒रस्य॑ । ग॒व॒यस्य॑ । गोहे॑ । यदि॑ । वाजा॑य । सु॒ऽध्यः॑ । वह॑न्ति ॥

Mantra without Swara
वि यद्वरांसि पर्वतस्य वृण्वे पयोभिर्जिन्वे अपां जवांसि। विदद्गौरस्य गवयस्य गोहे यदी वाजाय सुध्यो३ वहन्ति ॥

वि। यत्। वरांसि। पर्वतस्य। वृण्वे। पयःऽभिः। जिन्वे। अपाम्। जवांसि। विदत्। गौरस्य। गवयस्य। गोहे। यदि। वाजाय। सुऽध्यः। वहन्ति ॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (यदी) जो (सुध्यः) उत्तम बुद्धिवाले जन (वाजाय) वेग के लिये (गौरस्य) गौर (गवयस्य) गोसदृश के (गोहे) गृह में (वि, वहन्ति) स्वीकार करते हैं तो सुख को प्राप्त होते हैं और (यत्) जो मैं (पर्वतस्य) मेघ के (पयोभिः) जलों के सदृश पदार्थों और (वरांसि) स्वीकार करने योग्य धर्म्मयुक्त कर्म्मों का (वृण्वे) स्वीकार करूँ और (अपाम्) जलों के (जवांसि) वेगों के सदृश कर्म्मों को (विदत्) प्राप्त होता हुआ राज्य को (जिन्वे) शोभित करता हूँ, उनका और मेरा आप सत्कार करो ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे गवय के साधर्म्य को गौ धारण करती है, वैसे ही धार्मिक पुरुषों के साधर्म्य को राजा लोग धारण करें और जैसे मेघ जलदान से सब को तृप्त करता है, वैसे ही राजा अभयदान से सब को सुख देवे ॥८॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥